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आदि पर्व
अध्याय १२६
कर्ण उवाच
गुरोः समक्षं यावत्ते हराम्यद्य शिरः शरैः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
गुरोः सुतं चावरजं तथात्मनः; पदातिनोऽथ द्विपसादिनोऽन्यान् ||
५१ ग
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीय़सः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोरुच्छिष्टमित्येव द्रौपद्या वचनादपि ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोरुष्य सकाशे तु दश वर्षशतानि सः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोर्गरीय़सी वृत्तिर्या च शिष्यस्य भारत ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
गुरोर्गरीय़सी वृत्तिर्या चेच्छिष्यस्य भारत ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
गुरोर्गुरुं मां जानीहि ज्वलितं जातवेदसम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोर्भीतो विद्यया चोपहूतः; शनैर्वाचं जठरे व्याजहार |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
गुरोर्भय़ाच्चापि न चेलिवानहं; तच्चाववुद्धो ददृशे स विप्रः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
स्नुषो उवाच
गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोर्मे ज्ञाननिष्ठस्य हिमवत्पाद आसतः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
गुरोर्यः कृतकार्यः संस्तत्करोमि न भाषितम् |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोर्वक्तुं परिस्पन्दो मुदा प्रोत्साहतीव माम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
गुरोर्वचनमाज्ञाय़ स तु विप्रर्षभस्तदा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
गुरोर्हि दीर्घदर्शित्वं यत्तच्छिष्यस्य भारत ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
युधिष्ठिर उवाच
गुरोश्च वचनं प्राहुर्धर्मं धर्मज्ञसत्तम |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
गुरोश्चालीककरणं समं तद्व्रह्महत्यया ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
गुरोश्चालीकनिर्वन्धः समानि व्रह्महत्यया ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
गुरोस्तव प्रसादेन तव चैवोपशिक्षय़ा ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद्धर्मार्थकोविदः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
गुर्वर्थ इति चाकाममुपय़ाजमचोदय़त् |
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
उत्तङ्क उवाच
गुर्वर्थं कं प्रय़च्छामि व्रूहि त्वं द्विजसत्तम |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
गुर्वर्थं वा वालसंवृद्धय़े वा; धेनुं दद्याद्देशकाले विशिष्टे ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
गुर्वर्थं वाभय़ार्थं वा वर्जय़ित्वा युधिष्ठिर |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
गुर्वर्थमभिनिर्वर्त्य पुनरेष्यामि ते वशम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
गुर्वर्थश्च महान्पार्थ कृतः शत्रून्घ्नता मम ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
गुर्वर्थे कुण्डलाभ्यामर्थ्यागतोऽस्मीति ये ते क्षत्रिय़या पिनद्धे कुण्डले ते भवान्दातुमर्हतीति ||
१०८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
गुर्वर्थे वा वालपुष्ट्याभिषङ्गा; द्गावो दातुं देशकालोऽविशिष्टः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
गुर्वर्थे वा हतो युद्धे स मुच्येत्कर्मणोऽशुभात् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
गुर्वर्थे स्त्रीषु चैव स्याद्विवाहकरणेषु च ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
गुर्वर्थो दीय़तामेष यदि गालव मन्यसे |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
गुर्वर्थोऽय़ं समारम्भो न हय़ैः कृत्यमस्ति मे |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
गुर्व्यो गदा हेमपट्टावनद्धाः; शतघ्न्यश्च प्रादुरासन्समन्तात् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
गुहस्य ते स्वय़ं दत्ते शक्रेणानाय़्य धीमता ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
गुहाकन्दरसंलीनैः सिंहव्याघ्रैर्निषेवितम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
गुहाकारेण वक्त्रेण चतुर्दंष्ट्रेण राजता |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो वभूव ह ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
गुहाभ्य इव शैलानां पृषत्यो हतय़ूथपाः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालय़ाः ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गुहाय़ राजशार्दूल विनाशाय़ सुरद्विषाम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
गुहाय़ां निहितं व्रह्म दुर्विज्ञेय़ं सुरैरपि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
वलिरु उवाच
गुहाय़ां निहितानि त्वं मम रत्नानि पृच्छसि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
गुहाय़ां पिहितं नित्यं तद्दमेनाभिपद्यते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
गुहोऽपि शव्दं तं श्रुत्वा व्यनदत्सागरो यथा ||
७ ख