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शान्ति पर्व
अध्याय २५०
पितामह उवाच
गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा च विचारय़ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सञ्जय़ जानीहि भ्रातरं विदुरं मम |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
गच्छ सञ्जय़ यत्राग्निर्न त्वां दहति कर्हिचित् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
पितामह उवाच
गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रिय़म् ||
३४ ग
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सैरन्ध्रि भद्रं ते यथाकामं चरावले |
९ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सैरन्ध्रि मात्र स्थाः सुदेष्णाय़ा निवेशनम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सौम्य ततः शीघ्रं तूर्णं पानीय़मानय़ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छत त्वरिताः सर्वे यत्र राजा स कौरवः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
गच्छतस्तिष्ठतो वापि सर्वभूतहृदि स्थितम् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छतां घोषिणश्चित्राश्चारु वभ्राजिरे रथाः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
गच्छताद्यैव पाञ्चालान्द्रुपदस्य निवेशनम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
गच्छतो गच्छतः क्षेमं दुर्वलोऽत्रावसीदति |
३० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
गच्छत्यन्तर्हिता यत्र मरुपृष्ठे सरस्वती |
११८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
गच्छत्यपानोऽवाक्चैव समानो हृद्यवस्थितः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
गच्छत्यस्तं दिनकरे दीप्यमाना इवांशवः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
गच्छत्यात्मप्रसादेन विदुषां प्राप्तिमव्ययाम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
कपिल उवाच
गच्छत्येव परित्यागी वानप्रस्थश्च गच्छति |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
गच्छत्वेष यथाकामं सन्तुष्टो द्विजसत्तमः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
गच्छत्वेष यथाकाममिति राजन्पुनः पुनः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
गच्छध्वं तत्र मुनय़स्तत्रात्मा मे प्रकाशितः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
गच्छध्वं तेन शक्रस्य व्रह्मणश्च सलोकताम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः सार्धं यथागतम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छध्वं नगरं सर्वे पूज्याश्च गुरवो मम ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
गच्छध्वं मुनय़ः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
तक्षक उवाच
गच्छध्वं यूय़मव्यग्रा राजानं कार्यवत्तय़ा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
गच्छध्वं विवुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्रह्मो उवाच
गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकसः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
विष्णुरु उवाच
गच्छध्वं सर्षिगन्धर्वा यत्रासौ विश्वरूपधृक् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद्भय़मस्ति वः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छध्वं स्वानधीकारांश्चिन्तय़ध्वं यथाविधि |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
विष्णुरु उवाच
गच्छध्वमृषिभिः सार्धं गन्धर्वैश्च सुरोत्तमाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छध्वमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभाः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वय़ोतिगः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
गच्छन्ति चाय़ान्ति च तन्यमाना; स्तद्वच्छरीराणि शरीरिणां तु ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्रं चापि दक्षिणम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
गच्छन्ति मानुषाल्लोकात्स्वर्गलोकमनुत्तमम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
गच्छन्ति मुनय़ः सिद्धा ऋषिधर्मव्यपाश्रय़ात् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
गच्छन्ति योगिनो ह्येवं निर्वाणं तन्निरामय़म् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
मन्दपाल उवाच
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
गच्छन्ती सा चिरात्कालात्पुरमासादय़न्महत् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोकेऽपि च स्थितिम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
गच्छन्तीह सुसन्तुष्टा धर्म्यं पन्थानमुत्तमम् |
९० ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
गच्छन्तु कुञ्जराः सर्वे वाजिनश्च सह त्वय़ा |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्तु त्वरिताश्चैव गोपालाः प्रेषितास्त्वय़ा |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्तु दूतास्त्वरितं नगरं तव पार्थिव |
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
गच्छन्तु पदवीं शक्त्या भीमपार्षतय़ोर्युधि ||
५१ ख