उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
गुह्यं चैतत्त्वय़ा कार्यं नाख्यातव्यं शुभे क्वचित् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
गुह्यं मा धर्ममप्राक्षीरतीव भरतर्षभ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
गुह्यं व्रह्म तदिदं वो व्रवीमि; न मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किञ्चित् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन्युधिष्ठिरे ||
३४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
गुह्यकानां गतिं चापि केचित्प्राप्ता नृसत्तमाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
गुह्यकानां च सङ्ग्रामे नैरृतानां तथैव च |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
गुह्यकानां निवासेषु तापसाय़तनेषु च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
गुह्यकानामृषीणां च तथैवाप्सरसां गणाः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशय़ः ||
९८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
गुह्यकैरुह्यमाना सा खे विषक्तेव दृश्यते |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
गुह्यकोऽभ्यागतः श्वेतात्त्वत्सकाशमरिन्दम ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
गुह्यमर्थं मामकेभ्यो व्रवीमि; मातामहोऽहं भवतां प्रकाशः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
गुह्यमस्त्रं परं चापि तत्तुल्याधिकमेव वा |
१३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
गुह्यमेतत्तु देवानां कथय़िष्यामि ते नृप |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
गुह्यात्मन्सर्वभूतात्मन्स्फुटसम्भूतसम्भव |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
गुह्यानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतोऽच्युत |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
गुह्याय़ ज्ञानदृश्याय़ अक्षराय़ क्षराय़ च |
९६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
गुह्यो ह्ययं सर्वलोकस्य धर्मो; नेमं धर्मं यत्र तत्र प्रजल्पेत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
गूढं मां प्रश्नवित्प्रश्नं पृच्छसे त्वमिहानघ |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
गूढगुल्फा संहतोरुस्त्रिगम्भीरा षडुन्नता |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ||
१९ ग
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
गूढभावेषु छन्नेषु काले चोदय़मागते ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
गूढमन्त्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशय़म् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
गूढश्चरति लोकेऽस्मिन्नष्टरूपो महीपतिः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
गूढस्वाध्याय़तपसो व्राह्मणाः संशितव्रताः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
गूढस्वाध्याय़तपसो व्राह्मणान्संशितव्रतान् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
गूढो दुर्योधनस्तत्र दर्शय़ामास मातुलम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
गूढोच्छ्वसान्न नस्तत्र हुताशः सम्प्रधक्ष्यति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
गूढोत्तरांसान्भुजगेन्द्रभोग; प्रलम्ववाहून्पुरुषप्रवीरान् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
गूढोत्पन्नं सुतं वालं जले कर्णमवासृजम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
गूढोत्पन्नः सुतः कुन्त्या भ्रातास्माकं च सोदरः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
गूढोत्पन्नस्य चाख्यानं कर्णस्य पृथय़ात्मनः |
१८८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
गूढोऽज्ञानी वहिः शास्त्रं पठतां विस्वरं पदम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
गूहन्ति सर्पा इव गह्वराणि; स्वशिक्षय़ा स्वेन वृत्तेन मर्त्याः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
गूहमानापचारं तं वन्धुपक्षभय़ात्तदा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
गृणञ्शक्रः परं व्रह्म शतरुद्रीय़मुत्तमम् ||
१४७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
गृणन्तौ वेदविदुषौ तद्व्रह्म शतरुद्रिय़म् |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
गृद्धां वाससि सम्भ्रान्तां मेनकां मुनिसत्तमः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
गृद्धो दुर्योधनस्तत्र शकुनिश्चापि सौवलः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
गृध्यते हि सदा द्रोणो ग्रहणे तव संय़ुगे ||
४५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
गृध्रकङ्कवडश्येनश्वसृगालादनीकृतान् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
गृध्रकङ्कवडाश्चैव वाचोऽमुञ्चन्सुदारुणाः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
गृध्रगोमाय़वः शूरं वहुवन्धुमवन्धुवत् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
उमो उवाच
गृध्रगोमाय़ुकलिले चिताग्निशतसङ्कुले ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
गृध्रजम्वुकसंवादं यो वृत्तो वैदिशे पुरा ||
१ ख