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शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
गृध्रदृष्टिर्वकालीनः श्वचेष्टः सिंहविक्रमः |
६२ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
गृध्रपक्षैः शितैर्वाणैर्जघ्नुर्वै गजय़ोधिनः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
गृध्रपत्राधिवासांसि शय़नानि नराधिपाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
गृध्रराजो महावीर्यः सम्पातिर्यस्य सोदरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
गृध्रराजोऽस्मि भद्रं वां सखा दशरथस्य ह ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
गृध्रवाक्यात्कथं पुत्रं त्यजध्वं पितृपिण्डदम् ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
गृध्रा वडाश्च कङ्काश्च परिपेतुर्मुदा युताः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
गृध्राः कङ्का वडाः श्येना वाय़सा जम्वुकास्तथा |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
गृध्राः काका वडाः श्येना यातुधानाः शलावृकाः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
गृध्राः परिपतन्त्युग्रा वामं मण्डलमाश्रिताः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
गृध्राः श्येना वडाः कङ्का वाय़साश्च सहस्रशः |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
गृध्राणां गरुडानां च मकराणां तथैव च |
४४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
गृध्रानुत्सारय़न्त्यश्च गोमाय़ून्वाय़सांस्तथा |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
गृध्रास्ते पर्युपासन्ते सैन्यानि च समन्ततः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
गृध्रोऽनस्तमिते त्वाह गतेऽस्तमिति जम्वुकः |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
गृष्टीनां क्षीरदात्रीणां रोहिणीनां न तेन च ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरे |
८६ क
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहं गच्छाव भगवन्यदि रोचय़सेऽनघ ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
गृहं गत्वा मातरं रोदमानः; पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षय़न्ति कदाचन ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
गृहं वा गच्छ कौन्तेय़ किं ते युद्धेन वालक ||
७९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
गृहं वा गच्छ माद्रेय़ यत्र वा कृष्णफल्गुनौ ||
९४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
गृहं स्वं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
गृहधर्मरतो विद्वान्धर्मनित्यो जितक्लमः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
गृहमभ्यागताय़ाशु यो दद्यादन्नमर्थिने ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तय़ं वै सरस्वतीम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २२
स्त्र्यु उवाच
गृहमागम्य विश्रान्तः स्वजनं प्रतिपूज्य च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १३६
पौरा ऊचुः
गृहमात्मविनाशाय़ कारितं दाहितं च यत् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
गृहमानीय़ वध्नीमः क्रतुरेवं भवेन्न सः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
गृहमावसतो ह्यस्य नान्यत्तीर्थं प्रतिग्रहात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
गृहमेधिव्रतान्यत्र महान्तीह प्रचक्षते ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
गृहमेवाभिसंश्रित्य ततोऽन्ये व्रह्मचारिणः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
गृहस्थ एव यजते गृहस्थस्तप्यते तपः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थं हि सदा देवाः पितर ऋषय़स्तथा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
गृहस्थः पुरुषः कृष्ण शिष्टाशी च सदा भवेत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
गृहस्थता विशुद्धानां धर्मस्य निचय़ो महान् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
गृहस्थधर्मं विप्रेन्द्र कृत्वा पुत्रगतं त्वहम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १९७
व्राह्मण उवाच
गृहस्थधर्मे वर्तन्ती व्राह्मणानवमन्यसे ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
गृहस्थधर्मेणानेन कामक्रोधौ च ते जितौ ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
गृहस्थवृत्तिं प्रविशोध्य सम्य; क्स्वर्गे विषुद्धं फलमाप्नुते सः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
गृहस्थवृत्तय़श्चैव चतस्रः कविभिः स्मृताः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
गृहस्थवृत्तय़स्तिस्रस्तासां निःश्रेय़सं परम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
गृहस्थवृत्तय़स्त्वेता वर्तय़ेद्यो गतव्यथः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
गृहस्थव्रतमातिष्ठन्द्विकालकृतभोजनः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
गृहस्थस्त्वेव सर्वेषां चतुर्णां मूलमुच्यते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ||
६८ ख