शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थाः स्नातकाः सर्वे ददृशुः कुरुसत्तमम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
गृहस्थानव्यपाश्रित्य नाश्रमोऽन्यः प्रवर्तते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
गृहस्थानां च यद्भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
गृहस्थानां तु सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
गृहस्थानां हि सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थाश्रमिणस्तच्च यज्ञकर्म विरोधकम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थेभ्योऽभिनिर्वृत्ता गृहस्थानेव संश्रिताः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थैरेव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
कपिल उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी च उभौ तावपि गच्छतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
युधिष्ठिर उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
गृहस्नेहाववद्धानां नराणामल्पमेधसाम् |
८५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
गृहाट्टाट्टालकय़ुतं वृहत्प्राकारतोरणम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समय़ेन मे ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
कण्व उवाच
गृहाण च वरं मत्तस्तत्कृते यदभीप्सितम् ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण चक्रमित्युक्तो मय़ा तु तदनन्तरम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसम् ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
गृहाण धर्मराजं वा जहि वा त्वं धनञ्जय़म् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
गृहाण धारय़ेऽहं ते याचितं ते श्रुतं मय़ा |
१०९ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण न हि ते मुच्येदन्तकोऽप्यातताय़िनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान्यथेप्सितान् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहाण राज्यं विपुलं क्षेमं निहतकण्टकम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
गृहाण वरमस्मत्तः काङ्क्षितं यन्नरर्षभ ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
गृहाणात्र वरं भीष्म मत्प्रसादकृतं विभो ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
गृहाणानुनय़ं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाणास्त्रं महावाहो दण्डमप्रतिवारणम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद्यथेप्सितम् ||
१५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
गृहाणि च प्रविश्याथ विधेय़ः स्याद्धुताशनः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
गृहाणि च महार्हाणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
गृहाणि पर्वताश्चैव यावद्द्रव्यं च किञ्चन ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाणि राजमार्गे तु रत्नवन्ति वृहन्ति च |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाणेदं महावाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् |
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
गृहाणेमां महावाहो रक्षस्व कुलमात्मनः |
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
शुक्र उवाच
गृहाणेमां मय़ा दत्तां महिषीं नहुषात्मज ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाणेमां मय़ा प्रोक्तां सिद्धिं मूर्तिमतीमिव |
२७ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहाण्यवेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत पुनः क्वचित् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
गृहाण्येव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
गृहानावसता कृष्णे यथाशक्ति करोमि तत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
गृहानुत्सृज्य यो राजन्मोक्षमेवाभिपद्यते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
गृहानुपय़यौ चापि कृतार्थः स महामनाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहान्प्रस्थापय़ामास सगणं सहवान्धवम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहान्विहाय़ गच्छामो यत्र याति युधिष्ठिरः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहान्व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
गृही वदान्योऽनपविद्धवाक्यः; शेषान्नभोक्ताप्यविहिंसकश्च |
१३ क