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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
गृहीत एव तु तय़ा देवेन्द्रो भरतर्षभ |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
गृहीतं तममन्यन्त तव पुत्राः सुवालिशाः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतं पाणिना पाणिं भीमसेनोऽथ रक्षसा |
९५ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतं भुजगेन्द्रेण निश्चेष्टमनुजं तथा ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनञ्जय़ः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
गृहीतः कृच्छ्रमापन्नो रक्षसा भक्षय़िष्यता ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूय़ः प्रहारिणः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
गृहीतचापः समरे विमुञ्चंश्च शिताञ्शरान् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
गृहीतपाणिरेकासीत्प्राप्तशुल्कापराभवत् ||
३७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
गृहीतमाल्यदामां तां रथमारोप्य माधवीम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
गृहीतमृषिपुत्रेण स्वय़ं वाप्यृषिणा त्वय़ा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा; गत्वा प्रशंसामभिधाय़ तेषाम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतशस्त्रा ध्वजिनः स्वस्ति वाच्य हुताग्नय़ः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतशस्त्राभरणा वर्मिणो वाजिपृष्ठगाः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतस्य त्वय़ा राजन्प्राणिनोऽपि वलीय़सः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
गृहीता शकुनघ्नेन भार्या शुश्राव भारतीम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
गृहीतास्त्रस्ततो देवैरनुज्ञातोऽस्मि भारत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेय़ो भ्रातॄन्सस्मार पाण्डवः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतास्त्रो गुडाकेशो महावाहुर्महामनाः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
गृहीतो लोभमोहाद्वै दूरं च गमनं मम ||
२८ ग
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतो व्यजहात्सत्त्वं वरदानेन मोहितः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतो व्रह्मणा राजन्प्रय़ुक्तश्च यथाविधि |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरुराव महावलः |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रिय़ङ्करः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा च महाकाय़ं राक्षसेन्द्रमलम्वलम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
गृहीत्वा जाय़ते जन्तुर्दुःखानि च सुखानि च ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा तत्तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान् |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
गृहीत्वा तत्तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
गृहीत्वा तु धनुः साम्वः शाल्वस्य सचिवं रणे |
११ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा तु वलं सारं फल्गु चोत्सृज्य पाण्डवः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ तं कुमारमलङ्कृतम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ सचिवं वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहीत्वा देवसेनां तामवन्दत्स पितामहम् |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा द्रौपदीं राजन्निवर्ततु भवानितः ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा धनमाजग्मुर्वहूनि भरतर्षभ ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा धनुरन्यत्तु शल्यो विव्याध पाण्डवम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशं पुनरागमत् ||
१०३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा परिघं घोरं कर्णस्याश्वानपीपिषत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
गृहीत्वा प्रक्षिपन्त्यप्सु विश्रव्धाः सैनिकास्तय़ोः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
गृहीत्वा ये च गच्छन्ति येऽनुय़ान्ति च तान्मृतान् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजातिः कानने यथा ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा रथिनां श्रेष्ठं मत्समीपमिहानय़ ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
गृहीत्वा व्यजनं श्वेतं धर्मात्मा संशितव्रतः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
गृहीत्वा व्यनदद्भीमं चिक्रीड च महावलः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा सञ्जय़ं चासौ निवृत्तः शिनिपुङ्गवः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च |
६ क