chevron_left  गृहीत्वान्योन्यमावेष्ट्यarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
गृहीत्वान्योन्यमावेष्ट्य कुचेलावूचतुर्वचः ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वामरगर्भाभं पुत्रं कमललोचनम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्राह्मणा ऊचुः
गृहीत्वास्त्राण्यथो विप्रान्कपाः सर्वे समाद्रवन् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
गृहीत्वैतानि संय़ाति वाय़ुर्गन्धानिवाशय़ात् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
गृहे किल कृतावासाँल्लोभाद्राजन्नपीडय़त् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रिय़ङ्कराः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
गृहे चैषामवेक्षेथाः कच्चिदस्तीह जीवनम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
गृहे पन्नगराजस्य प्रय़त्नात्पर्यरक्ष्यत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
गृहे पारावता धन्याः शुकाश्च सहसारिकाः |
१०६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
गृहे यत्क्षत्रिय़स्यापि निधनं तद्विगर्हितम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
गृहे यस्य वसेत्तुष्टः प्रधानं लोकमश्नुते ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
गृहे वसन्तं गोमाय़ुं त्वं वै मत्वा न वुध्यसे |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
गृहे वसेदमात्यस्ते यः स्यात्परमपूजितः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
गृहे वासय़ितव्यास्ते धन्यमाय़ुष्यमेव च ||
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
गृहे शय़नमप्येकं निशाय़ां यत्र लीय़ते ||
१३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
गृहे स्थापय़ितव्यानि धन्यानि मनुरव्रवीत् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
गृहेभ्य एव निष्क्रम्य वनमन्ये समाश्रिताः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
गृहेषु येषामसवः पतन्ति; तेषामथो निर्हरणं प्रशस्तम् |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
गृहेषु वनवासेषु गुरुवासेषु भिक्षुषु |
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
कीट उवाच
गृहेषु सुनिवासेषु सुखेषु शय़नेषु च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
गृहेष्वेते न पापाय़ तथा वै तैलपाय़िकाः ||
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरगृहोपमम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
गृहोद्देशं ततस्तत्र दर्शनीय़मदर्शय़त् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
गृह्णन्ति विहितं त्वेवं पिण्डो देय़ः कुशेष्विति ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९०
द्रुपद उवाच
गृह्णन्त्विमे विधिवत्पाणिमस्या; यथोपजोषं विहितैषां हि कृष्णा ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
गृह्णन्नञ्जलिमालाश्च धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
गृह्णातु भीमो जलजानि कामं; कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
गृह्णातु विधिवत्पाणिमद्यैव कुरुनन्दनः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
गृह्णातु स गदां यो वै युध्यतेऽद्य मय़ा सह ||
६० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
गृह्णात्यनेकानपि कङ्कपत्रा; नेकं यथा तान्क्षितिपान्प्रमथ्य |
४० क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
गृह्णीत चापानि महाधनानि; शरांश्च शीघ्रं पदवीं व्रजध्वम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
गृह्णीत वध्नीत निकृन्ततेमं; पचाम खादाम च भीमसेनम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
गृह्णीताद्रवतान्योन्यं विभीता विनिकृन्तत |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
गृह्णीषे न च तन्मोहात्पाण्डवेषु विशां पते ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विकृत उवाच
गृह्णीय़ां गच्छतु भवानभ्यनुज्ञां ददानि ते ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
गृह्णीय़ात्तु धनुर्वैश्यः परित्राणाय़ चात्मनः ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
गृह्य सञ्ज्ञां ततो भीमो गदय़ा व्यचरद्रणे |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
गृह्यन्त इव धावन्ति गच्छन्तः श्वभ्रमुन्मुखाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
गृह्या हि देवता नित्यमाशंसन्ति गृहात्सदा |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
गृह्याणां चैव देवानां नित्यं पुष्पवलिक्रिय़ा ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीय़न्ते विधिनार्चिताः ||
८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
गोकर्णमपि चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
गोकर्णमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गोकर्णी च सुकर्णी च ससिरा स्थेरिका तथा |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
सूत उवाच
गोकर्णे पुष्करारण्ये तथा हिमवतस्तटे ||
३ ख