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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
गोप्ता ह्येष महेष्वासो भीष्मोऽस्माकं पितामहः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
गोप्तारं सर्वभूतानामिष्वासधरमच्युतम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
गोप्तारः सङ्ग्रहीतारो दातारः क्षत्रिय़ाः स्मृताः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
भीमसेन उवाच
गोप्तारः सानुवन्धांस्तान्नेष्यामि यमसादनम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
गोप्तारावर्जुनस्यैतावर्जुनोऽपि शिखण्डिनः ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
गोप्तारौ फल्गुनस्यैतौ फल्गुनोऽपि शिखण्डिनः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
गोप्रतारं ततो गच्छेत्सरय़्वास्तीर्थमुत्तमम् |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
गोप्रदाता समाप्नोति समस्तानष्टमे क्रमे ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
गोप्रदानं तारय़ते सप्त पूर्वांस्तथा परान् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसञ्चय़ान् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
गोप्रदानानुकल्पं तु गामृते सन्ति गोप्रदाः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
गोप्रदाने गुणान्सम्यक्पुनः प्रव्रूहि भारत |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
गोप्रदानेन मिथ्या च व्राह्मणेभ्यो महामखे |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
युधिष्ठिर उवाच
गोप्रदानेऽन्नदाने च भूय़स्तद्व्रूहि कौरव ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
गोप्रय़ुक्तं धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहितः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
गोपय़ामास राजेन्द्र सर्वतः समलङ्कृतम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
गोभिः पूर्वविसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
गोभिः समुद्रेण तथा गोलाङ्गूलर्क्षवानरैः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै; स्तत्रासन्गाः शतमर्वुदानि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
गोभिर्धनैश्च रत्नैश्च स चैनं पुनरव्रवीत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
गोभिर्नृपेह संवादं श्रिय़ा भरतसत्तम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
गोभिर्वस्त्रैश्च राजेन्द्र विविधैश्च किमिच्छकैः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
गोभिश्च समनुज्ञातः सर्वत्र स महीय़ते ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किञ्चिदिहाच्युत ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
गोमतीं धूतपापां च वन्दनां च महानदीम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
गोमतीगङ्गय़ोश्चैव सङ्गमे लोकविश्रुते |
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
गोमतो धनिनश्चैव परिपाल्या विशेषतः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
गोमत्या दक्षिणे चैव शक्रस्येवामरावतीम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य यः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
गोमन्दः पर्वतो राजन्सुमहान्सर्वधातुमान् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
गोमाय़वश्च प्राक्रोशन्भय़दान्दारुणान्रवान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
गोमाय़वश्चानुलोमा वडा गृध्राश्च सर्वशः |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
गोमाय़वो विकर्षन्ति पादौ शिष्यशतार्चितौ ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
गोमाय़ुः प्रश्रितं वाक्यं वभाषे किञ्चिदानतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
गोमाय़ुः प्राय़मासीनस्त्यक्त्वा देहं दिवं यय़ौ ||
८६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
गोमाय़ुगणसङ्कीर्णा क्षणेन रजनीमुखे ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
गोमाय़ुत्वं च सम्प्राप्तो दूषितः पूर्वकर्मणा ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
गोमाय़ुनेव सिंहानां दुर्वलेन वलीय़साम् |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
गोमाय़ुरेष सेनाय़ा रुवन्मध्येऽनुधावति |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
गोमाय़ुवडसङ्घुष्टा शक्तिध्वजसमाकुला |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
गोमाय़ुसङ्घाश्च वदन्ति रात्रौ; रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् |
९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
गोमिनां पार्थ कर्तव्यं संविभागाः प्रिय़ाणि च ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
गोमूत्रभोजनश्चैव शाकपुष्पाद एव च ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
गोमूत्रिकाणि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
गोमय़ेन सदा स्नाय़ाद्गोकरीषे च संविशेत् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
गोरथं गिरिमासाद्य ददृशुर्मागधं पुरम् ||
३० ख