वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
गोरसानुपय़ुञ्जान उपभोगांश्च भारत |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
गोरुतं भरतश्रेष्ठ रामवाणप्रपीडितम् ||
१५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
गोलाङ्गूलर्क्षसङ्घैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
गोलाङ्गूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान्प्रचक्षते ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
गोलाङ्गूलैर्महाभागो गृध्रकूटेऽभिरक्षितः ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
गोलाङ्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
गोलोकवासिनः पश्ये व्रजतः संशय़ोऽत्र मे ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
गोलोको व्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः |
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
गोवत्सं वडवा सूते श्वा सृगालं महीपते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
गोवर्धनो धारितश्च गवार्थे भरतर्षभ ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
गोवर्धनो नाम वटः सुभाण्डं नाम चत्वरम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
गोवासदासमीय़ानां वसातीनां च भारत |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
गोवासना व्राह्मणाश्च दासमीय़ाश्च सर्वशः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
गोवासमिव वीक्षन्तः सिंहा हैमवता यथा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
गोविन्द इति मां देवा वाग्भिः समभितुष्टुवुः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
गोविन्द उज्जहाराशु वाराहं रूपमाश्रितः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
गोविन्द कस्माद्भगवन्रथो दग्धोऽय़मग्निना ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
गोविन्द मय़ि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
गोविन्दः सात्यकिश्चैव जगाम भवनं स्वकम् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
गोविन्दवाक्यं त्वरितं विचिन्त्य; दध्रे मतिं शल्यविनाशनाय़ |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
गोविन्दस्य प्रिय़श्चासीत्पिता ते जनमेजय़ |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
गोविन्दा मन्दकाः षण्डा विदर्भानूपवासिकाः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
गोविन्दात्तु परो राजन्निविडो नाम पर्वतः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
गोवृषाविव नर्दन्तौ विषाणोल्लिखिताङ्कितौ ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
गोवृषाविव संरव्धौ विषाणोल्लिखिताङ्कितौ ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
गोवृषो गौतमस्यासीत्कृपस्य सुपरिष्कृतः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
गोव्राह्मणकृते प्राणान्हुत्वात्मीय़ान्रणाजिरे ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
गोव्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
स्कन्द उवाच
गोव्राह्मणस्य त्राणार्थं सेनापत्येऽभिषिञ्च माम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
गोव्राह्मणहितार्थं च वर्णानां सङ्करेषु च |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
गोव्राह्मणहितार्थाय़ रणे चाभिमुखो हतः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
गोव्राह्मणार्थं युद्धेन सम्प्राप्ता गतिमुत्तमाम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
गोव्राह्मणार्थे विक्रान्तः सङ्ग्रामे निधनं गतः |
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
गोव्राह्मणार्थे शस्त्रपूतान्तरात्मा; हतः सङ्ग्रामे क्षत्रिय़ः स्वर्गमेति ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
गोव्राह्मणार्थे साहाय़्यं कुर्वाणा वै न संशय़ः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
गोव्राह्मणे च यज्ञे च नित्यं स्वस्त्ययनं मम |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
गोश्ववाहनसम्पूर्णां वाहुवीर्यसमार्जिताम् ||
७८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
गोषु क्षान्तं गोशरण्यं कृतज्ञं; वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं; वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
गोषु गोवृषसङ्काशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
गोषु गोवेषमाय़ान्तं पाण्डुभूतास्मि भारत ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
गोषु चात्मसमं दद्यात्स्वय़मेव कृषिं व्रजेत् |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
गोषु नष्टासु पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
गोषु प्रय़ातासु जवेन मत्स्या; न्किरीटिनं कृतकार्यं च मत्वा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
गोषु भक्तश्च लभते यद्यदिच्छति मानवः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
गोषु वृत्तिं समाधाय़ पीताः कृष्युपजीविनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
गोष्पदं प्राप्य सीदेत महौजाः शिनिपुङ्गवः ||
३३ ग