शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
गौतमान्तकरं घोरं समादत्त शिलीमुखम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्वाच्छरद्वतः |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
गौतमी नाम कौन्तेय़ स्थविरा शमसंय़ुता |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
गौतमीं कौशिकीं पाकां महात्मानो धृतव्रताः |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
गौतमेत्यभिभाषन्तः पुरद्वारमुपागमन् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
गौतमो दक्षिणे पार्श्वे शकैश्च यवनैः सह ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
गौतमो द्विगुणं कालमुक्तवानिति नः श्रुतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
गौतमो नगरद्वाराच्छीघ्रमानीय़तामिति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
गौतमो नगरर्द्धिं तां पश्यन्परमविस्मितः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
गौतमोऽपि तदापेत्य धनुर्वेदपरोऽभवत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
गौतमोऽपि त्वराय़ुक्तो माधवं नवभिः शरैः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
गौतमोऽपि धनुस्त्यक्त्वा प्रगृह्यासिं सुसंशितम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय़ सत्वरः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्णं विकुरुते पुनः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
गौरः कृष्णश्च वर्णौ द्वौ तय़ोर्वर्णान्तरं नृप ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
गौरः प्रलम्वोज्ज्वलचारुघोणो; विनिःसृतः सोऽच्युत धर्मराजः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
गौरजो मनुजो मेषो वाज्यश्वतरगर्दभाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
गौरप्राय़ो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान्मानय़तां च तान् |
१०० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
गौरवात्तव राजेन्द्र वहून्क्लेशांस्तितिक्षति ||
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
गौरवाद्वहुमानाच्च हार्देन प्रिय़काम्यया ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
गौरवेण निरुद्धश्च निग्रहादर्जुनस्य च ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जय़ेत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
गौरवेणाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मानःशिलो महान् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
गौरिव नित्यं गुरुषु धूर्षु निय़ुज्यमानः शीतोष्णक्षुत्तृष्णादुःखसहः सर्वत्राप्रतिकूलः ||
८१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
गौरिव प्रस्रवत्येषा रसमुत्तमशालिनी |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वय़ा |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
गौरीभिः सह नारीभिर्वृहतीभिः स्वलङ्कृताः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
गौर्गां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा स्थितिः सदा ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
गौर्गौरिति पुरा मन्द द्रौपदीमेकवाससम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
गौर्निपानमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
गौर्मे माता गोवृषभः पिता मे; दिवं शर्म जगती मे प्रतिष्ठा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
गौर्हि न्याय़ागता दत्ता सद्यस्तारय़ते कुलम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
ग्रथय़िष्ये विचित्राश्च स्रजः परमशोभनाः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
ग्रन्थस्यार्थं च पृष्टः संस्तादृशो वक्तुमर्हति |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
ग्रन्थिं विनीय़ हृदय़स्य सर्वं; प्रिय़ाप्रिय़े चात्मवशं नय़ीत ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३
नकुल उवाच
ग्रन्थिको नाम नाम्नाहं कर्मैतत्सुप्रिय़ं मम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
ग्रन्थीन्विमुच्य हृदय़स्य सर्वा; न्प्रिय़ाप्रिय़े स्वं वशमानय़ीत ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
ग्रसन्तमिव लोकांस्त्रीन्सूर्याचन्द्रमसौ यथा |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ग्रसन्निव च चेतांसि तावकानां महाहवे ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
ग्रसमानमनीकानि नरवारणवाजिनाम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारय़न् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम् ||
२० ख