आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्तु पुरुषाः शीघ्रं नगरं वारणावतम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनी |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
गच्छन्त्यभिमुखा गङ्गां द्रोणशिष्या द्विजातय़ः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
गच्छन्त्यमुत्रलोकं वै क एनमनुगच्छति ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
गच्छन्त्यास्तु तदा देवाः सर्वे च परमर्षय़ः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्त्यौ शैलराजेऽस्मिन्राजपुत्र्यौ कथं त्विमे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
गच्छन्नेव च गोविन्दं सन्नकण्ठोऽभ्यभाषत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
गच्छन्नेव तु कौन्तेय़ो धर्मराजदिदृक्षय़ा |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्नेव महावाहुः सर्वय़ादवनन्दनः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां पतिम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
गच्छन्नेवाशृणोच्छव्दं दुर्योधनवले महत् ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्स तीर्थानि महानुभावः; पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
गच्छमानान्स्म तानाह निर्घृणाः खलु मानवाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
गच्छस्व सुकृतं कृत्वा किं वान्यच्छ्रोतुमिच्छसि |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
गच्छानय़ विशालाक्षि शरानेतान्धनुश्च्युतान् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छानय़ैनामिह मन्दभाग्यां; समातृपक्षामिति राजपुत्रीम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
युधिष्ठिर उवाच
गच्छाम पुण्यं विख्यातं महद्द्वैतवनं सरः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
गच्छामहे वय़ं द्रष्टुं तं च देवमहोत्सवम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
गच्छामि तस्यान्तिकमेव तात; का नाम सा व्रतचर्या च तस्य |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
व्राह्मण उवाच
गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
काश्यप उवाच
गच्छामि सौम्य त्वरितं सद्यः कर्तुमपज्वरम् ||
३७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सात्यकिरु उवाच
गच्छामि स्वस्ति ते व्रह्मन्न मे कालात्ययो भवेत् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
गच्छामुष्मिन्नसौ देशे व्राह्मणो मां प्रतीक्षते |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
गच्छाम्यवुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
काश्यप उवाच
गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
गच्छाम्यहं वनमेवाद्य पापः; सुखं भवान्वर्ततां मद्विहीनः |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छाम्यामन्त्रय़ामि त्वां सुखमस्म्युषितस्त्वय़ि ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो; वह्वाश्चर्यः श्रूय़ते तस्य यज्ञः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वय़मद्य वै ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छाय़ोध्यां प्रशाधि त्वं राम रक्तान्तलोचन ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गच्छेत तत उद्यन्तं पर्वतं गीतनादितम् |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
गच्छेत परमां सिद्धिमृणैर्मुक्तः कुरूद्वह ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
गच्छेति तं नारदमुक्तवान्स; सम्पूजय़ित्वात्मविधिक्रिय़ाभिः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
गच्छेति वसुभिश्चोक्तो मम चेदं शशंस सः ||
१९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
गच्छेत्परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशय़ः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
गच्छेत्प्राप्याक्षय़ं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
गच्छेदग्निर्विभोरास्यं तथास्त्रं भीममावृणोत् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
गच्छेदन्तं सृञ्जय़ानां प्रिय़स्त्वस्य धनञ्जय़ः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
गच्छेदानीं न ते स्थानमनृतस्येह विद्यते |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
यक्ष उवाच
गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान्यथासुखम् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
गच्छेय़ं तदवाप्येह वर एष वृतो मय़ा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
गच्छेय़ं तद्गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
गजं च शरवृष्ट्या तं विभिदुस्ते समन्ततः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
गजं तु सगजारोहं पदातींश्च चतुर्दश |
७ क