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द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
ग्रसिष्याम्यद्य सौभद्रं यथा राहुर्दिवाकरम् ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०
इन्द्र उवाच
ग्रसेत्त्रिभुवनं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
ग्रसेद्व्यूहः क्षितिं सर्वामिति भूतानि मेनिरे ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
ग्रस्त आसीद्गृहेणेव पर्वकाले दिवाकरः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
ग्रस्तचक्रस्तु राधेय़ः कोपादश्रूण्यवर्तय़त् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
ग्रस्तमाचार्यपुत्रेण क्रुद्धेन हतवन्धुना |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचय़त् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचय़त् ||
१५३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
ग्रस्तमेव तदुद्दानं गृहीत्वास्त तथैव सः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
ग्रस्तमेवमनाक्रन्दे भद्रे काममहाहिना |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ग्रस्तां सुपर्णस्य वलेन वर्तिका; ममुञ्चतामश्विनौ सौभगाय़ |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्तान्गन्धर्वराजेन मज्जतो ह्यप्लवेऽम्भसि |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
ग्रस्तान्हि कौरवान्मन्ये मृत्युना तात सङ्गतान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
ग्रस्तान्हि प्रतिपश्यामि भूमिपालान्ससैन्धवान् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदशास्तदा |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्तौ हि कर्णेन समेत्य कृष्णा; वन्ये च सर्वे तव शत्रवो ये ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्यते युधि वीरेण भानुमानिव राहुणा |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
ग्रस्यतेऽकर्मशीलस्तु सदानर्थैरकिञ्चनः ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ग्रस्यमानं सात्यकिना खे सोममिव राहुणा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहं तु सुषुवे यं तं सिंही चन्द्रार्कमर्दनम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
ग्रहणं चेज्जय़ं तस्य मन्यसे पुरुषर्षभ |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
ग्रहणं धर्मराजस्य खगः श्येन इवामिषम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
ग्रहणं धर्मराजस्य भारद्वाजोऽनुगृध्यति |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
ग्रहणात्सुखदुःखस्य छिन्नस्य च विरोहणात् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
अप्सरस ऊचुः
ग्रहणे कृतवुद्धीनां देवेश तव शासनात् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
ग्रहणे धर्मराजस्य सर्वोपाय़ेन वर्तते ||
४६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रताराभिः प्रकीर्णाभिरलङ्कृतम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रताराभिरनुय़ातममित्रहा ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
ग्रहनक्षत्रताराभिश्चर्म चित्रं नभस्तलम् ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रशवला द्यौरिवासीद्वसुन्धरा ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
ग्रहश्च तिर्यग्ज्वलितार्कवर्णो; यमस्य पुत्रोऽभ्युदिय़ाय़ राजन् ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
ग्रहा यज्ञाश्च सोमश्च दैवतानि च सर्वशः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषय़ो मातरस्तथा |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
ग्रहास्तमुपसर्पन्ति सारमेय़ा इवामिषम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहीतुं तच्च शक्रोऽस्य तदा कालं चकार ह ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहीतुं नाशकंश्चैनं तं त्वं प्रार्थय़से वलात् ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहीतुं नाशकत्तत्र तं त्वं प्रार्थय़से वलात् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहीतुं नाशकत्तत्र तं त्वं प्रार्थय़से वलात् ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण्यु उवाच
ग्रहीतुं येन तच्छक्यं लक्षणं तस्य तत्क्व नु ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
ग्रहीतुं समरे शक्यः सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
ग्रहीतुं स्वगुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहीतुकामो विक्रम्य सर्वय़त्नेन माधवम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
ग्रहीष्यन्तं तु तं सोममश्विनोरुत्तमं तदा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तय़तां भवान् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ग्रहीष्यामि चमूं भित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रहैरपश्यन्सर्वे ते नात्मनस्तु कथञ्चन ||
१४ ख