आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मय़ा ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
शकुन्ताः शकुनिं कृष्ण समन्तात्पर्युपासते |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन्देवमानुषाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं वहु |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
शकृन्मूत्रे निवस नः पुण्यमेतद्धि नः शुभे ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शकैः किरातैर्यवनैः पह्लवैश्च; सार्धं चमूमुत्तरतोऽभिपाति ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
शकैश्चापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमैः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्त एकरथेनैव विजेतुं नात्र संशय़ः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तः प्रदग्धुं ह्यपि तिग्मतेजाः; ससागरामप्यवनिं महर्षिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
शक्तः स्यात्सुमुखो राजा कुर्यात्कारुण्यमापदि |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
शक्तश्चापि रणे द्रोणो निगृहीतुं युधिष्ठिरम् ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
शक्तस्त्वमसि विक्रान्तुं विश्रमस्व निशामिमाम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम् |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
शक्ता सती धार्तराष्ट्रान्नादहद्घोरचक्षुषा ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारय़ितुं तथा |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
शक्ताः कथय़ितुं सम्यक्ते तव स्युः सभासदः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तास्त्रातुं मय़ा द्विष्टं सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शक्तिं कण्ठे समादाय़ द्वितीय़ इव पावकः ||
१४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं कनकवैडूर्यचित्रदण्डां परामृशत् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं कनकवैडूर्यभूषितामाय़सीं दृढाम् |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसय़ित्वा महाद्युते |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप कर्णाय़ तामप्यस्याच्छिनच्छरैः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप कर्णाय़ सङ्क्रुद्धः शत्रुतापनः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप चित्राय़ स्वर्णघण्टामलङ्कृताम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेय़स्य रथं प्रति ||
१०२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप वेगेन प्राग्ज्योतिषगजं प्रति ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप सङ्क्रुद्धः सौभद्रस्य रथं प्रति ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप सङ्क्रुद्धो महोल्कां ज्वलितामिव ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप समरे रुक्मदण्डामय़स्मय़ीम् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिक्षेप समरे सर्वपारशवीं शुभाम् ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिच्छेद सहसा कृतहस्तो महावलः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं चिच्छेद सहसा भगदत्तेरितां रणे |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं जग्राह विपुलां रुक्मदण्डामय़स्मय़ीम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं जग्राह सङ्क्रुद्धो गिरीणामपि दारणीम् |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं जग्राह समरे गिरीणामपि दारणीम् |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं जग्राह समरे हेमदण्डामय़स्मय़ीम् |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तिं तस्मै ददौ शक्रः विस्मितो वाक्यमव्रवीत् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं तां प्रहतां दृष्ट्वा चित्रो गृह्य महागदाम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं त्रिभिः शरैश्छित्त्वा तोमरं त्रिभिरर्जुनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
शक्तिं न हापय़िष्यन्ति ते काले प्रतिपूजिताः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलनन्दनम् |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
शक्तिं येनासृजद्दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशां पते |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशां पते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा भीमश्चुक्रोध वै भृशम् ||
२२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा सौवलं च भय़ार्दितम् |
४० क