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भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
गजेन्द्राणां मदगन्धांश्च तीव्रा; न्न सेहिरे तव पुत्रस्य नागाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
गजेन्द्राश्च मदोद्वृत्ताः प्रभिन्नकरटामुखाः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
गजेन्द्रैश्च तथैवान्ये केचिदुष्ट्रैर्नराधिप |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
गजेभ्यः पृथिवीं जग्मुर्मुक्तप्रहरणाङ्कुशाः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
गजेष्वन्ये रथेष्वन्ये हय़ेष्वन्ये च भारत ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
गजैर्गजा रथिभिरुदाय़ुधा रथा; हय़ैर्हय़ाः पत्तिगणैश्च पत्तय़ः ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
गजैर्निकृत्तापरहस्तगात्रै; रुद्वेपमानैः पतितैः पृथिव्याम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
गजैर्मत्तैः समाकीर्णं सवर्माय़ुधकोशकैः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः; केचित्ससूता रथिनः प्रपेतुः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
गजैश्च पतितैर्नीलैर्गिरिशृङ्गैरिवावृतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
गजैश्च वहुधा छिन्नैः शय़ानैः पर्वतोपमैः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ७
भीम उवाच
गजैश्च सिंहैश्च समेय़िवानहं; सदा करिष्यामि तवानघ प्रिय़म् ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
गजैश्चाचलसङ्काशैर्भीमकर्मा वृकोदरः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
गजो गजं समासाद्य द्रवमाणं महारणे |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
गजो गजेन समरे रथी च रथिनं यय़ौ |
७९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
गजो गजेनाभिहतः पपात; पदातिना चाभिहतः पदातिः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
गजो गजेनेव मय़ा दुरात्मा; यो योद्धुमाकाङ्क्षति सूतपुत्रः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
गजो गवाक्षो वृषकश्चर्मवानार्जवः शुकः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
गजो वा महिषो वापि षष्ठे काले नरोत्तम ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
गजो वाजी नरो वापि पुनः स्वस्ति गृहान्व्रजेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
गजौघवेगोद्धतसादितानां; श्रुत्वा निषेदुर्वसुधां मनुष्याः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
गजौघाश्च महाराज संसक्ताः स्म परस्परम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
गजय़ुक्ता महाराज रथाः षड्विंशतिस्तथा |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
गजय़ुद्धेषु कुशलाः कलिङ्गैः सह भारत ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
गणः क्रोधवशो नाम क्रूरकर्मारिमर्दनः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन्प्रकीर्तितः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम्य एव च |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
गणग्रामाभिशस्तानां रङ्गस्त्रीजीविनश्च ये |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
गणमुख्यैस्तु सम्भूय़ कार्यं गणहितं मिथः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
गणस्त्वप्सरसां यो वै मय़ा राजन्प्रकीर्तितः |
९३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गणा च सुगणा चैव तथाभीत्यथ कामदा ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
गणा देवानामूष्मपाः सोमपाश्च; लेखाः सुय़ामास्तुषिता व्रह्मकाय़ाः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
गणात्क्रोधवशादेवं राजपूगोऽभवत्क्षितौ |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
गणाधिपत्यं प्राप्नोति निःसपत्नमनाविलम् ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
गणाध्यक्षेक्षितमुखं गौरीहृदय़वल्लभम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
गणानां च कुलानां च राज्ञां च भरतर्षभ |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
गणानां भेदने योगं गच्छेथाः सह मन्त्रिभिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
युधिष्ठिर उवाच
गणानां वृत्तिमिच्छामि श्रोतुं मतिमतां वर ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
गणानुत्सवसङ्केतानजय़त्सप्त पाण्डवः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
गणानुत्सवसङ्केतान्व्यजय़त्पुरुषर्षभः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
गणाश्चाप्सरसां तत्र गन्धर्वाणां तथैव च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
गणितः पञ्चवीर्यश्च आदित्यो रश्मिमांस्तथा |
३४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
गणेषु पश्य राजेन्द्र वृष्ण्यन्धकमहारथान् |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथात्मजैः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गण्डो उवाच
गण्डं गण्डं गतवती गण्डगण्डेति सञ्ज्ञिता |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् |
९७ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
गण्डकीय़ां तथा शोणं सदानीरां तथैव च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गण्डो उवाच
गण्डगण्डेव गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
गण्यमानेषु वर्षेषु क्षीय़माणे तथाय़ुषि |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
गणय़न्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते |
२ क