अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
घातको वधवन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
घातको वध्यते नित्यं तथा वध्येत वन्धकः |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
घातिता पृथिवी चेय़ं सहसा सनरद्विपा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
घातिता राज्यलुव्धेन मय़ैकेन पितामह ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
घातय़त्यनिशं भीष्मः प्रवराणां प्रहारिणाम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
घातय़न्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
घातय़ानं हि पुरुषं येऽनुमन्येय़ुरर्थिनः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
सुदेष्णो उवाच
घातय़ामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
घातय़ित्वा कथं तात ह्रदे तिष्ठसि साम्प्रतम् ||
२४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
घातय़ित्वा कथं द्रोणं भीष्मं चापि पितामहम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
घातय़ित्वा गुरूंश्चैव मृतं श्रेय़ो न जीवितम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
घातय़ित्वा जरासन्धं चैद्यं च वलगर्वितम् ||
८६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
घातय़ित्वा जरासन्धं वुद्धिपूर्वमरिन्दमः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
घातय़ित्वा तमेवाजौ छलेनाजिह्मय़ोधिनम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
घातय़ित्वा पितृन्भ्रातृन्पुत्रान्सम्वन्धिवान्धवान् ||
१९६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
घातय़ित्वा महावीर्यं पितरं लोकधार्मिकम् ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
घातय़ित्वा महीपालानृजुय़ुद्धान्सहस्रशः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
घातय़ित्वा वय़स्यांश्च भ्रातॄनथ पितॄंस्तथा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
घातय़ित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिन्दमाः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
घातय़ित्वा सर्वसैन्यं भ्रातॄंश्चैव सुय़ोधन ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
घातय़ित्वाद्य राज्यार्थे मृतं श्रेय़ो न जीवितम् ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
घातय़ित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गतः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
घातय़िष्यति कौरव्यान्परित्रातुमशक्नुवन् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
घातय़िष्यति मे पुत्रान्सर्वान्भीमो न संशय़ः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
घातय़िष्याम नृपतिं द्रुपदं सशिखण्डिनम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
घातय़िष्यामि गाङ्गेय़मित्युलूकस्य संनिधौ ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
घातय़ेय़ं यदि रणे भीष्ममित्येव नित्यदा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
घुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव कर्हिचित् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
घुष्यतां राजधानीषु सर्वसम्पन्महीक्षिताम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ||
६९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
घुष्यमाणे महादाने दिक्षु सर्वासु भारत |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरञ्जय़ ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
घूर्णतो हि वलौघस्य दिवं स्तव्ध्वेव निस्वनः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
ऋत्विज ऊचुः
घूर्णन्नाकाशे नष्टसञ्ज्ञोऽभ्युपैति; तीव्रान्निःश्वासान्निःश्वसन्पन्नगेन्द्रः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
घूर्णमानं यथा शैलं तदा मे कश्मलोऽभवत् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
घूर्णे रथे व्राह्मणस्याभिशापा; द्रामादुपात्तेऽप्रतिभाति चास्त्रे ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
घृणी कर्णः प्रमादी च तेन मेऽर्धरथो मतः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
घृणी राजा पुंश्चली राजभृत्यः; पुत्रो भ्राता विधवा वालपुत्रा |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
घृणी व्राह्मणरूपोऽसि कथं क्षत्रे अजाय़थाः |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
घृतं तैलं च गन्धांश्च क्षौमाणि वसनानि च ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
घृतं दद्याद्घृतं प्राशेद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
घृतं दद्याद्द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
घृतं प्राशेद्घृतं दद्याद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
घृतं माल्यं च गन्धांश्च क्षौमाणि च युधिष्ठिरः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
घृतं मासे आश्वय़ुजि विप्रेभ्यो यः प्रय़च्छति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
घृतं मे हृदय़े नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम् ||
२ ख