वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो वहुशतास्तथा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतय़ोन्यो घृतोद्भवाः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
घृतक्षीरसमाय़ुक्तं विधिवत्षष्टिकौदनम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
घृततोय़ः समुद्रोऽत्र दधिमण्डोदकोऽपरः |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
घृतधाराहुतैर्दीप्तैः पावकैः समदाहय़न् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
घृतपाय़सेन मधुना भक्ष्यैर्मूलफलैस्तथा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
व्यास उवाच
घृतपूर्णं कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीय़ताम् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
घृताक्तश्चीरवासास्त्वं मध्येनोत्तर्तुमिच्छसि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
घृताचाः सोमवाय़व्या वैखानसमरीचिपाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वय़म्प्रभा |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
घृताचीं नामाप्सरसमपश्यद्भगवानृषिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
घृतात्सारं यथा मण्डस्तथैतत्सारमुद्धृतम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षय़ा ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
घृतार्चिरहमव्यग्रैर्वेदज्ञैः परिकीर्तितः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
घृतालाभे च यो दद्यात्तिलधेनुं यतव्रतः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलङ्कृतम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
घृतेन जुहुय़ादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचय़ेत् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
घृतेन जुहुय़ादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचय़ेत् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
घोरं कपिध्वजं दृष्ट्वा विषण्णा रथिनोऽभवन् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
घोरं जलचरारावरौद्रं भैरवनिस्वनम् |
८ क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
घोरं ज्ञातिवधं चैव न भुञ्जे शोककर्शितः ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
घोरं तद्वैशसं दृष्ट्वा निपतत्यतिदुःखिता ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
घोरं प्राणभृतां काले घोररूपं परन्तप ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
घोरं रूपमथो कृत्वा भीमसेनमभाषत |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
घोरं व्रतं व्राह्मणस्यैतदाहु; रेतद्राजन्यदिहाजीवमानः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
घोरः प्रतिभय़श्चासीत्पिनाकीव पिनाकधृक् ||
५२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
घोरः शव्दः श्रूय़ते वै महास्वनो; वज्रस्यैष सहितो मारुतेन |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
घोरमप्रिय़माख्यातुं नाशकत्पार्थिवर्षभः ||
९४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागजः ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
घोरमासीत्ततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
घोरमाय़ोधनं जज्ञे पशूनां वैशसं यथा ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
घोरमाय़ोधनं जज्ञे प्रेतराजपुरोपमम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
घोरमाय़ोधनं जज्ञे भूतसङ्घसमाकुलम् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
घोरमाय़ोधनं जज्ञे महाभ्रसदृशं रजः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
घोरमोहजनाकीर्णं वर्तमानमचेतनम् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
घोररूपं ततस्ते स्म नावेक्षन्त परस्परम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
घोररूपं तदत्यर्थं यन्त्रं देवैः सुनिर्मितम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
घोररूपं महाराज भीरूणां भय़वर्धनम् ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
घोररूपं महाराज वकपाण्डवय़ोर्महत् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
घोररूपमसंवार्यं निर्मर्यादमतीव च ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
घोररूपमय़ुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः |
६९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
घोररूपाः समाजग्मुर्भूतसङ्घाः समन्ततः ||
४८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
घोररूपाणि चित्राणि तत्र तत्र विशां पते ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
घोररूपान्परिक्लेशान्दुर्योधनकृतान्वहून् |
९ क