chevron_left  घोररूपैर्महेष्वासोarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
घोररूपैर्महेष्वासो विव्याध च ननाद च ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
घोररूपो महाराज योधानां हर्षवर्धनः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
घोररूपौ हि तावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्वुदौ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
घोरश्चटचटाशव्दः शस्त्राणां पततामभूत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
घोरस्तस्योरसि विभो निपपाताशु भारत ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
घोरा समभवत्सन्ध्या दारुणा मृगपक्षिणः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
घोरां विस्मापनीमुग्रां जीवितच्छिदमप्लवाम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
घोराणि रूपाणि तथैव चाग्नि; र्वर्णान्वहून्पुष्यति घोररूपान् |
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
घोरानपि दुराधर्षान्नृपतीनुग्रतेजसः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
घोरान्नादान्विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
घोरामन्यां शिवामन्यां ते तनू वहुधा पुनः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
घोरामशान्तां रुशतीं सदा वाचं प्रभाषसे ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
घोराश्च घोरनिर्ह्रादाः शिवास्तत्र ववाशिरे |
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
घोराश्च परिघप्रख्या दन्दशूका महावलाः |
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
घोरास्तस्यास्त्रय़ः पुत्राः पापकर्मरताः सदा |
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
घोरे तमसि मग्नानां निघ्नतामितरेतरम् ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
घोरे तमस्ययुध्यन्त सहिता देवदानवाः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
घोरे निशामुखे रौद्रे वर्तमाने सुदारुणे ||
७८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
घोरे शरान्धकारे तु कर्णास्त्रे च विजृम्भिते ||
४१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
घोरेण तपसा युक्ता देवी कच्चिन्न शोचति ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
घोरेण तपसा राजंस्तप्यमानो महातपाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः शितधारैरय़ोमुखैः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
घोरैर्हलहलाशव्दैर्मा गास्तिष्ठैहि मामिति |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
गन्धर्व उवाच
घोरो नादः श्रूय़ते वासवस्य; नभस्तले गर्जतो राजसिंह |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
घोरो निनादः प्रवभौ नरेन्द्र; वज्राहतानामिव पर्वतानाम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिचरो नभः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
घोरो वज्रविनिष्पेषः स्तनय़ित्नोरिवाम्वरे ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
घोरो विरूपः संवर्तः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्येव सहस्रशः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
घोषश्चान्यः प्रादुरासीत्सुघोरः; सहस्रशो नदतां दुन्दुभीनाम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
घोषाः प्रणाशं गच्छेय़ुर्यदि राजा न पालय़ेत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
घोषान्न्यसेत मार्गेषु ग्रामानुत्थापय़ेदपि |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
घोषान्विद्राव्य तरसा गोधनं जह्रुरोजसा ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
घोषेण महता राजन्पूरय़ित्वेव मेदिनीम् |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
घोषय़ात्रा च गन्धर्वैर्यत्र युद्धं किरीटिनः ||
१२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
घोषय़ात्रा ततः पर्व मृगस्वप्नभय़ं ततः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
घोषय़ात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशय़ः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
घोषय़ात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशय़ः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
घ्नतश्च मे गतः कालः सुवहून्प्राणिनो रणे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
घ्नन्तं कुरूणामिषुभिर्वलानि; पुनः पुनर्वाय़ुरिवाभ्रपूगान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
घ्नन्ति चान्यान्नरा राजंस्तानप्यन्ये नरास्तथा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तास्ते वै निरय़गामिनः ||
२२ ख