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अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
चकमे पुरुषश्रेष्ठं स्वेन भावेन भारत ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
चकम्पतुश्चोन्नमतः स्म विस्मय़ा; द्विय़द्गताश्चार्जुनकर्णसंय़ुगे ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
चकम्पिरे वातवशेन काले; प्रकम्पितानीव महावनानि ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
चकम्पिरे शङ्खमृदङ्गनिस्वनैः; प्रकम्पितानीव वनानि वाय़ुना ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
चकम्पे च महाकम्पं पृथिवी सवनद्रुमा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
चकर्त काय़ाद्धि शिरो भीमं विकृतदर्शनम् ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
चकर्त गार्ध्रपत्रेण जातरूपपरिष्कृतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
चकर्त निषितैर्भल्लैर्धनूंषि च शिरांसि च ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
चकर्त भीष्मस्य तदा जातरूपपरिष्कृतम् ||
२४ ग
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
चकर्ष क्रोशतो भूमौ घृष्टजानुशिरोक्षिकान् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
चकर्ष दोर्भ्यामुत्पाट्य भीमो मल्लममित्रहा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं वुवुधे ततः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन्सलिलसञ्चय़े ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
चकार कदनं घोरं क्रुद्धः काल इवापरः ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
चकार कदनं घोरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा महावलः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
चकार गमने वुद्धिं परलोकाय़ वै तदा ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
चकार गौतमः सज्यं तदद्भुतमिवाभवत् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
चकार च पुनर्वीरस्तस्मिन्सरसि तद्धनुः ||
७७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
चकार च महीं योधैस्तीर्णां वेदीं कुशैरिव ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
चकार च यथाकाममाहारं पतितैः फलैः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
चकार चैव मर्यादामिमां स्त्रीपुंसय़ोर्भुवि ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
चकार तत्र पन्थानं यय़ौ येन जनार्दनः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
चकार तस्मै परमं प्रसादं; विभाण्डको भूमिपतेर्नरेन्द्र ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
चकार न व्यथां विप्रो राजा त्वेनमथाव्रवीत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
चकार नातिय़त्नेन तदद्भुतमिवाभवत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
चकार नेत्रय़ोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
चकार पत्नीं कन्यां तु दय़ितां गिरिकां नृपः ||
३५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
चकार पुण्यं लोके तु सुमहान्तं पृथा तदा ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
चकार फल्गुनं चापि सन्दिदेश हय़ं प्रति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
चकार भार्गवो राजन्महीं शोणितकर्दमाम् ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
चकार भावं संसर्गे तय़ा कामवशं गतः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
चकार मण्डलं तत्र विवुधानां प्रदक्षिणम् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
चकार महतीं पार्थो नदीमुत्तरशोणिताम् ||
१८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
चकार मोघांस्तान्वाणानय़त्नाद्भरतर्षभ ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
चकार यत्नं द्रुपदः सर्वस्मिन्स्वजने महत् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
चकार यामप्रतिमां महात्मा; सभां मय़ो देवसभाप्रकाशाम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
चकार राजतो राजन्भ्राजमान इवांशुमान् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
चकार राज्ञो निर्जीवान्प्रहसन्पाण्डवर्षभः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं; कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
चकार वहुधात्मानं भीषय़ाणो नराधिपान् ||
९९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
चकार विक्रय़ं तेषां पतङ्गानां नराधिप ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
चकार विधिवच्छौचं गान्धारी च यशस्विनी ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
चकार विधिवद्धौम्यस्तेषां भरतसत्तम ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
चकार विरथं कर्णं तव पुत्रस्य पश्यतः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
चकार विरथांश्चैव कौन्तेय़ः श्वेतवाहनः ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
चकार वै धनुर्वेदे यत्नमद्भुतविक्रमः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
चकार स तदा भीष्मः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
६९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
चकार स हतः शेते नैनमस्त्राण्यपालय़न् ||
२८ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
चकार सज्यं कृच्छ्रेण सम्भ्रमे तुमुले सति |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
चकार सज्यं गाण्डीवं वज्रनिष्पेषगौरवम् |
४० क