अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वशः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ते तु शूरा महाराज कृतचित्ताः स्म योधने |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ते तु संमानिता राजंस्त्वय़ा राज्यहितार्थिना |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
ते तु सर्वप्रय़त्नेन भारद्वाजं जिघांसवः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
ते तु सर्वे द्विजश्रेष्ठाः पाण्डवानां हितेप्सय़ा |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन्हलाय़ुधम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
ते तु सर्वे सुनामानमग्निमिद्धमिव प्रभुम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ते तु सेने समासाद्य वेगवत्यौ परस्परम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
ते ते च तांस्तानहितानस्माकं घ्नन्तु मामकाः ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
ते ते जिता देवराज्यं च कृत्स्नं; वृहस्पतिश्चेद्याजय़ेत्त्वां नरेन्द्र ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ते ते तत्तच्छरैर्व्याप्तं मेनिरेऽऽत्मानमेव च ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
ते ते पादं तितिक्षन्तामलं सन्तस्तितिक्षितुम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
ते ते राष्ट्रे प्रवर्तन्तां मा भूतानामभावकाः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ते ते सैन्यं समासाद्य व्याघ्रा इव वलोत्कटाः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ते त्यजन्त्याहवे प्राणान्रसागृद्धास्तरस्विनः ||
७० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ते त्रसन्तो महेष्वासा रात्रिय़ुद्धस्य भारत |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
ते त्रस्ता नरशार्दूल व्रह्माणं शरणं यय़ुः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्रिगर्ताश्च मत्स्याश्च संरव्धा युद्धदुर्मदाः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्वतीत्य जनाकीर्णास्तिस्रः कक्ष्या नरर्षभाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
ते त्वत्प्रिय़ं करिष्यन्ति तं चेष्यन्ति वृका इव ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
ते त्वदीय़ान्समासाद्य हय़सङ्घान्महाजवान् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भृशं शोकपराय़णाः |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
ते त्वनेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजाः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ते त्वन्योन्यं सुसंरव्धाः पाण्डवाः कौरवैः सह |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
ते त्वमर्षवशं प्राप्ता ह्रीमन्तः सत्त्वचोदिताः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ते त्वरध्वं महावीर्याः किं चिरेण प्रय़ामहे |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
ते त्वरध्वं यथा शूराः शराणां मोक्षणे भृशम् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्वर्चिता यथाशास्त्रं यथावर्णं यथाक्रमम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ते त्वर्जुनं समासाद्य योधाः शतसहस्रशः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीय़ाः प्रय़त्नतः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
ते त्वा जानन्ति निपुण आत्मा च रुचिरेव च ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
ते त्वां ज्ञातिक्षय़करं वय़मार्तानुसारिणः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
ते त्वां तात निषेवेय़ुर्यावदार्द्रकपाणय़ः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
ते त्वां देवाः सगन्धर्वा ऋषय़श्च महाद्युते |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
ते त्वां निवारय़न्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रय़ोजय़ ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
ते त्वां निहन्युः कुपिताः साध्वलं मा व्यनीनशः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
ते त्वां निहन्युर्दुर्धर्षाः शूराः साहसकारिणः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
ते त्वां प्राप्य रणे क्रुद्धं नाभ्यवर्तन्त दंशिताः ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
ते त्वां प्रिय़ं करिष्यन्ति पुरो धास्यन्ति च ध्रुवम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
ते त्वां विभेदय़िष्यन्ति दुःखशीला मदन्तरे ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
राजो उवाच
ते त्वां सशिष्यमिह पातय़न्तु; मद्वाक्यनुन्नाः शितशूलासिहस्ताः ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपाः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
ते त्वां हर्षस्मितं दृष्ट्वा गुरोः कर्मानिवेदकम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ते त्वार्यधर्मसंरव्धा दुर्निवार्या दुरासदाः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ते त्वार्यभावात्पुरुषप्रवीराः; पराङ्मुखा न वभूवुस्तदानीम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ते त्वाशुगतिना तेन त्रास्यमाना नरर्षभाः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्वाशुगतिभिर्वीरा राक्षसैस्तैर्महावलैः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
ते त्वास्थाय़ रथान्सर्वे वहुशस्त्रपरिच्छदान् |
१५ क