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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिय़ा विजिगीषवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सर्वतोऽव्रुवन् |
१२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सात्यकिरु उवाच
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति यन्मां प्रभाषथ |
४२ क
वन पर्व
अध्याय २५५
युधिष्ठिर उवाच
न हन्तव्यो महावाहो दुरात्मापि स सैन्धवः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
न हन्तव्योऽस्मि ते राजन्करिष्यामि हि ते प्रिय़म् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
न हन्तुमैच्छद्दाशार्हः पावको न ददाह च ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
न हन्यां निरय़े घोरे पतेय़ं वृष्णिपांसन ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
न हन्यां मानवश्रेष्ठान्सङ्ग्रामेऽभिमुखानिति ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
न हन्यात्पाण्डवः सङ्ख्ये तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
न हन्याम वय़ं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्वलम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न हन्यामर्जुनं यावत्तावत्पादौ न धावय़े |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
न हन्यामहमेतेन कारणेन शिखण्डिनम् ||
६३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
न हरेय़ं प्रजा देव पुनस्त्वाहं प्रसादय़े ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
न हर्तव्यं परधनमिति धर्मः सनातनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
न हर्षात्सम्प्रपश्यामि वाक्यस्यास्योत्तरं क्वचित् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
न हास्तिनपुरं प्राप्तास्त्वं च कर्ण विकत्थसे ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
न हास्तिनपुरे त्राणं तव पश्यामि किञ्चन |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
न हास्तिनपुरे राजन्नवकाशोऽभवत्तदा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
न हास्यते कर्म यथाप्रतिज्ञं; पुत्रैः शपे केशव सोदरैश्च |
१०० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
न हाय़नैर्न पलितैर्न वित्तेन न वन्धुभिः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
न हाय़नैर्न पलितैर्न वित्तेन न वन्धुभिः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
न हाय़नैर्न पलितैर्न वित्तेन न वन्धुभिः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
न हाय़नैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च वन्धुभिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न हि कर्णं रणे दृष्ट्वा युधि स्थास्यन्ति पाण्डवाः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
न हि कर्णः समुद्भूतो भय़ार्थमिह मारिष |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
न हि कर्णो महेष्वासान्पार्थाञ्ज्येष्यति सञ्जय़ ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
न हि कश्चन शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न हि कश्चित्कृते कार्ये कर्तारं समवेक्षते |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
न हि कश्चित्क्वचिद्राजन्दिष्टात्प्रतिनिवर्तते |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
न हि कश्चित्क्षमाकालो विद्यतेऽद्य कुरून्प्रति |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
न हि कश्चित्पुमांस्तत्र योऽर्जुनं प्रत्ययुध्यत ||
३३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
न हि कश्चित्स्वय़ं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रिय़ाः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
न हि कश्चिदिहास्माभिः सुवालोऽप्यपरीक्षितः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि कश्चिद्धि शूराणां युध्यमानः पराङ्मुखः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
न हि कामात्मना राज्ञा सततं शठवुद्धिना |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न हि कामान्न च द्रोहात्स्वधर्मं हातुमर्हसि ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
न हि कार्पण्यमास्थाय़ शक्या वृत्तिर्युधिष्ठिर |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथञ्चन |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २२४
मन्दपाल उवाच
न हि कार्यमनुध्याति भार्या पुत्रवती सती ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
न हि कार्यविरुद्धेषु वह्वपाय़ेषु कर्मसु |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि किञ्चिददेय़ं मे गुरवे व्रह्मवित्तम |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
न हि किञ्चिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवाः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
न हि किञ्चिद्विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रिय़ः ||
१३ ख