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आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च; तथाभूता गर्भभूता भवन्ति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
चतुष्पदां गौः प्रवरा लोहानां काञ्चनं वरम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पदी हि निःश्रेणी कर्मण्येषा प्रतिष्ठिता |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
चतुष्पदी हि निःश्रेणी व्रह्मण्येषा प्रतिष्ठिता |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
चतुष्पात्कच्छपादन्यो मण्डूका जलजाश्च ये ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
चतुष्पात्सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पात्सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः ||
७३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
चतुष्पात्सकलो धर्मो व्राह्मणानां विधीय़ते |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
चतुष्पादं दशविधं धनुर्वेदमरिन्दमः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
चतुष्पादस्त्वय़ा धर्मश्चितो लोक्येन कर्मणा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
चतुष्पाद्वहुरूपश्च पुनर्भवति वालिशः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि रथानामनिवर्तिनाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
चत्वरेषु च तीर्थेषु सभास्वावसथेषु च |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
चत्वार एकतो वेदा भारतं चैकमेकतः |
२०८ क
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
चत्वार एकतो वेदाः क्षात्रमेकत्र दृश्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
चत्वार एते होतारो यैरिदं जगदावृतम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
चत्वारः पर्वताः केन पातिता भुवि तेजसा ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारः पाण्डवा राजन्भीमसेनपुरोगमाः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारः पाण्डवा वीरा गन्धर्वाश्च सहस्रशः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारः पाण्डवाश्चैव ते च शारद्वतादय़ः ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
चत्वारः सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजसः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
चत्वारश्चाश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलाय़ते ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
चत्वारश्चैव राजानस्तथाहं च सुमध्यमे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
चत्वारस्ते वय़ं शिष्या गुरुपुत्रश्च पञ्चमः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
चत्वारस्तेन मे वाहाः सूतश्चैव विशां पते |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
चत्वारि कर्माण्यभय़ङ्कराणि; भय़ं प्रय़च्छन्त्ययथाकृतानि |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
चत्वारि च सहस्राणि वर्षाणां कुरुसत्तम |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
चत्वारि तु सहस्राणि वासुदेवस्य येऽनुगाः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु; श्रिय़ाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
चत्वारि भद्राण्याप्नोति कीर्तिमाय़ुर्यशो वलम् ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
चत्वारि भारते वर्षे युगानि भरतर्षभ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
चत्वारि यस्य द्वाराणि सुगुप्तान्यमरोत्तमाः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
चत्वारि राज्ञा तु महावलेन; वर्ज्यान्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात् |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३
भीष्म उवाच
चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तय़ेत् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
चत्वारि सम्प्रवर्धन्ते कीर्तिराय़ुर्यशोवलम् ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारिंशतमष्टौ च द्वे चाष्टौ सम्यगाचरेत् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
चत्वारिंशत्सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारिंशद्दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
चत्वारो लोकपालाश्च देवाः सर्षिगणास्तथा |
६ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
राजो उवाच
चत्वारो वा गर्दभास्त्वां वहन्तु; श्रेष्ठाश्वतर्यो हरय़ो वा तुरङ्गाः |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
चत्वारो ह्याश्रमा देव सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारोऽपि तदा वर्णा वभूवुर्व्राह्मणोत्तराः ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
चत्वारोऽप्सु गुणा राजन्गन्धस्तत्र न विद्यते |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
चत्वारोऽभ्याहनन्वाहानाशु ते व्यसवोऽभवन् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
चत्वार्याह महाराज सद्यस्कानि वृहस्पतिः |
६० क