वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
चत्वार्याहुर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
चत्वार्येतानि तेजांसि वहञ्श्वेतहय़ो रथः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
चत्वार्येव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ||
१७२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
चत्वार्येषामन्ववेतानि सद्भि; श्चत्वार्येषामन्ववय़न्ति सन्तः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनस्य रसैः शीतैः पुण्यगन्धैर्निषेवितम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागरुदिग्धेषु हारनिष्कधरेषु च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागरुमुख्यानि तथा कालागरूणि च ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
चन्दनागुरुकाष्ठानां भारान्कालीय़कस्य च |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीय़कान्युत |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागुरुदिग्धाङ्गास्तेऽद्य पांसुषु शेरते ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
चन्दनागुरुपङ्काक्तां प्रमदामीप्सितामिव |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
चन्दनागुरुमुख्यानि त्वक्पत्राणां वनानि च |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागुरुमुख्यानि दिव्यान्याभरणानि च ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमुक्तमनुत्तमम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
चन्दनी पद्ममालाग्र्यः सुरभ्युत्तरणो नरः |
१३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
चन्दने मलपङ्के च भोजनेऽभोजने समाः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनेन च मुख्येन शुक्लेन समलेपय़न् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
चन्दनैः स्पन्दनैः शालैः सरलैर्देवदारुभिः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामैश्च शोभितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
चन्द्र एव त्वमावास्यां तथा भवति मूर्तिमान् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
चन्द्रं यथा परिविष्टं ससन्ध्यं; वर्षात्यये तद्वदपश्यमेनम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रप्रभं श्वेतमस्यातपत्रं; सौवर्णी स्रग्भ्राजते चोत्तमाङ्गे |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रप्रभां सुरुचिरां सिक्तां परमवारिणा ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा वहिर्गताः ||
३५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
चन्द्रमा इव कोशानां पुनस्तत्र सहस्रशः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
चन्द्रमा येन संय़ुक्तः प्रकाशगुणधारणः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
चन्द्रमाः प्रददौ मेषमादित्यो रुचिरां प्रभाम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो ज्योतिर्भूत इवावृतः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो वाय़ुश्चैव प्रदक्षिणम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वसाय़ाः श्वसनस्तथा ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
गाधिरु उवाच
चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हय़ानां वातरंहसाम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्ररश्मिप्रभे शुभ्रे माद्रीपुत्रावलङ्कृते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
चन्द्रवृद्धिक्षय़वशादुद्वृत्तोर्मिदुरासदम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रशीतलगात्र्यश्च नृत्तगीतविशारदाः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
चन्द्रसूर्यगतिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रसूर्यप्रकाशाभ्यां चक्राभ्यां समलङ्कृतम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
चन्द्रसूर्यप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम् ||
७ ख