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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा वा पुण्डरीकाक्ष वाक्यमुक्तमिदं भवेत् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
त्वय़ा विनिकृता माता पिता च द्विजसत्तम |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वय़ा विनिकृता राजन्राज्यस्य हरणेन च ||
६६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
त्वय़ा विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वय़ोतिगः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा विनिहताः सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
त्वय़ा विभ्रंशिता हीय़ं भर्तारं नाभिगच्छति ||
१८ ग
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
त्वय़ा विमथितं वीर स्ववीर्यास्त्रतपोवलात् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
त्वय़ा विहीनं तस्मात्त्वं मां परित्यक्तुमर्हसि ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
त्वय़ा वृत्रो हतः पूर्वं देवराज जगत्पते ||
१६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा वै सम्प्रतिज्ञाते सिन्धुराजवधे तदा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा शरशतैश्छिन्नं रथं हेमविभूषितम् |
८९ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सञ्जनितोऽत्यर्थं कर्णेन च विवर्धितः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सम्प्रेषिताः पार्थ नार्थं कुर्वन्ति पत्रिणः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
त्वय़ा सर्वात्मना नित्यं विजिता जेष्यसे च तान् ||
१८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सह गदाय़ुद्धं त्रिदशैरुपपादितम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
नल उवाच
त्वय़ा सह नरश्रेष्ठ मम यत्र स्वय़ंवरः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मातर ऊचुः
त्वय़ा सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा सह महावाहो किष्किन्धोपवने तदा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वय़म् ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
त्वय़ा सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथञ्चन ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा साक्षान्महादेवस्तोषितो हि महामृधे |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
त्वय़ा साधो समागम्य विमुक्तः पापय़ोनितः ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा सारथिना पार्थः खाण्डवेऽग्निमतर्पय़त् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सारथिना पार्थो यत्कुर्यादद्य पौरुषम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सारथिना ह्येष अप्रधृष्यो भविष्यति |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा सार्धं हृषीकेश श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सूत उवाच
त्वय़ा सुवहवो युद्धे निर्जिताः शत्रुसूदन |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २८२
ऋषय़ ऊचुः
त्वय़ा सुशीले धृतधर्मपुण्यया; समुद्धृतं साध्वि पुनः कुलीनय़ा ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
त्वय़ा सृष्टमिदं विश्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् |
१०९ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
मन्दपाल उवाच
त्वय़ा सृष्टमिदं विश्वं वदन्ति परमर्षय़ः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
त्वय़ा सृष्टमिदं विश्वं वदन्तीह मनीषिणः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
त्वय़ा सृष्टमिदं सर्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
त्वय़ा सृष्टा कथं नारी मादृशी वदतां वर |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा हतस्येह ममाद्य कृष्ण; श्रेय़ः परस्मिन्निह चैव लोके |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
त्वय़ा हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
त्वय़ा हि तीर्थेषु पुरा समाप्लावः कृतोऽसकृत् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा हि देव सङ्ग्रामे हतस्यापि ममानघ |
६१ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
त्वय़ा हि पृथिवी राजन्रक्ष्यमाणा महात्मना |
११ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
त्वय़ा हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
त्वय़ा हि मे वहु कृतं यथा नान्यः करिष्यति |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
त्वय़ा हि याव्यमानोऽहं प्राणाञ्जह्यां सवान्धवः ||
१८० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
त्वय़ा हि शक्तेन सता मिथ्याचारेण माधव |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा हीनं वलं ह्येतद्विद्रविष्यति भारत |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा हीनो महावाहो कां नु यास्याम्यहं गतिम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
त्वय़ा हीनौ न जीवाव मुहूर्तमपि पुत्रक |
८६ क