शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
त्यागधर्मं पवित्राणां संन्यासं परमव्रवीत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
त्यागधर्मविदं मुण्डं कञ्चिदस्योपवर्णय़ |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
त्यागधर्मविदो वीराः स्वय़मेव त्यजन्त्युत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
त्यागमूलं हि शूराणां स्वर्गद्वारमनुत्तमम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
त्यागवर्त्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यागवांश्च पुनः पापं नालं कर्तुमिति श्रुतिः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यागवाञ्जन्ममरणे नाप्नोतीति श्रुतिर्यदा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
त्यागवाताध्वगा शीघ्रा नौस्त्वा सन्तारय़िष्यति ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
त्यागवाताध्वगां शीघ्रां वुद्धिनावा नदीं तरेत् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
त्यागश्च सन्नतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ||
४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
त्यागस्यापि च सम्पत्तिः शिष्यते तप उत्तमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
त्यागात्तेभ्यो निरोधः स्यान्निरोधज्ञो विमुच्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
त्यागान्न भिक्षुकं विद्यान्न मौण्ड्यान्न च याचनात् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
त्यागान्नान्यत्र मर्त्यानां गुणास्तिष्ठन्ति पूरुषे ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
त्यागाप्रमादाकृतिना साम्येन परमासिना ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यागिनः प्रसृतस्येह नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय़ः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च वुद्धिमान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च वुद्धिमान् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
त्यागेन यः सहाय़ानां स्वान्प्राणांस्त्रातुमिच्छति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय़ धर्मवित् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
त्यागो ध्यानमथार्यत्वं धृतिश्च सततं स्थिरा |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यागय़ुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
त्याजितो हि मय़ा जातिमेष राजा भृगूद्वह ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
त्याज्यांस्त्यक्त्वाथासुराणां वधाय़; कार्याकार्ये कारणं चैव पार्थ |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
त्रसदस्युश्च तान्सर्वान्प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
त्रसदस्युश्च तुरय़ः कृतवीर्यः श्रुतश्रवाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
त्रसदस्युस्तथा राजा श्वेतो राजर्षिसत्तमः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्रसन्ति यस्माद्भूतानि तथा परिभवन्ति च ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
त्रसानां खलु सर्वेषां श्रेष्ठा राजञ्जराय़ुजाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
त्रसानां त्रिविधा योनिरण्डस्वेदजराय़ुजाः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
त्रसानां स्थावराणां च द्विपदानां भय़ं त्यजेत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रसेय़ुस्तद्वदेवासीद्धार्तराष्ट्रवलं तदा ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
त्रस्तं सासुरगन्धर्वं सकिंनरमहोरगम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
त्रस्तमुद्विग्नहृदय़ं हाहाभूतमचेतनम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
त्रस्तरूपतरा राजन्कौरवाः प्राद्रवन्भय़ात् ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रस्ता विगतसङ्कल्पा दृष्ट्वा पार्थान्महौजसः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रस्तानि मृगय़ूथानि समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
त्रस्तानि सर्वभूतानि व्यगच्छन्त महाहवात् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
त्रस्तान्कुन्तीसुतान्दृष्ट्वा द्रोणसाय़कपीडितान् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
त्रस्तामाश्वासय़न्सेनामत्रस्तो वाक्यमव्रवीत् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रस्ताश्च रथिनः सर्वे वभूवुस्तत्र सर्वशः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
त्राणार्थं वा वधेनैषामथ वा नृपकर्मणा ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
त्राणाय़ाप्यसमर्थं तं मन्यमानमतीव च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
त्राता ह्यभवदन्येषां न त्रातव्यः कथञ्चन ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
त्राताः सर्वे प्रमथ्यारीन्क्षत्रधर्मेण विष्णुना ||
२२ ख