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स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
चराणां स्थावराणां च गृध्येत्तत्र न पण्डितः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
चराणामचरा ह्यन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
चराम सर्वे पृथिवीं पुण्यतीर्थां; तन्नः कार्यं हन्त गच्छाम सर्वे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
चरामि पृथिवीं कृत्स्नां नैनमासादय़ाम्यहम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
चरामि पृथिवीं देवि यथा हन्यामहं नृपम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
चरामि मृगय़ूथानि निघ्नन्वाणैः सहस्रशः |
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
चरामि व्रह्मचर्यं वै सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षय़ा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
चरामो विपुलं धर्मं तेषां चांशोऽस्ति धर्मतः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
चरितं तस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय़ ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
चरितं भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
चरितं महात्मनो दिव्यं साङ्ग्रामिकमिदं शुभम् |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
जनमेजय़ उवाच
चरितं श्रोतुमिच्छामि दिवि चेह च सर्वशः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
जनमेजय़ उवाच
चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
चरितव्रतो वाल एव वुद्धिसत्त्वगुणान्वितः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
चरितव्रह्मचर्यस्य व्राह्मणस्य विशां पते |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
चरितव्रह्मचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
चरितव्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगाः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
चरितव्रह्मचर्याश्च सर्वे चातितपस्विनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
चरितव्रह्मचर्यास्ते कृतदाराश्च पार्थिव |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
चरितव्रह्मचर्यास्ते सोमपा भूरिदक्षिणाः |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
चरितव्रह्मचर्यो हि प्रजाय़ेत यजेत च |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
चरित्वा विविधान्मार्गान्मण्डलं स्थानमेव च |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
चरिष्यति महावाहुः कक्षेऽग्निरिव सञ्ज्वलन् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविधीय़ताम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिषेविते ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
चरिष्यस्युपरिस्थो वै देवो विग्रहवानिव ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कापुरुषे तथा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
चरिष्ये धर्ममेवेति तृतीय़ात्परिमुच्यते ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
चरुं नरेन्द्र सप्तार्चेर्यथाशक्ति निवेदय़ेत् |
१०६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
चरुद्वय़ं गृहीत्वा तु राजन्सत्यवती तदा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
चरुद्वय़मिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
चरेत्तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
चरेत्तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
चरेत्संवत्सरं चापि तद्व्रतं यन्निराकृति ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
चरेत्सप्त गृहान्भैक्षं स्वकर्म परिकीर्तय़न् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
चरेद्धर्मानकटुको मुञ्चेत्स्नेहं न नास्तिकः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
चरेय़ुः सर्व एवैते वीरहा यद्व्रतं चरेत् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
चरेय़ुर्नाश्रमे धर्मं यथोक्तं विधिमाश्रिताः |
४० क
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
चरैश्चेन्नोऽविदितः कालमेतं; युक्तो राजन्मोहय़ित्वा मदीय़ान् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभय़प्रदम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
चर्म चादाय़ खड्गं च नदन्पर्यपतद्रथात् ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
चर्म चाप्रतिमं राजन्नार्षभं पुरुषर्षभ |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
चर्म च्छित्त्वा तु कैकेय़स्तारागणशतैर्वृतम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
चर्म स्नाय़ु तथा वेत्रं मुञ्जवल्वजधन्वनान् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
चर्मखड्गे च सङ्गृह्य सत्वरं व्राह्मणं यय़ौ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तथा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ||
९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
चर्मण्वतीं वेत्रवतीं हस्तिसोमां दिशं तथा ||
१८ ख