शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
तथा ह्याचरतो धर्मो नृपतेः स्यादथाखिलः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ह्युपेता वुद्ध्या त्वं कृष्णस्य महिषी प्रिय़ा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
तथा ह्येनमतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तथा ह्येवं पुनश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तथा हय़वरान्राजन्निजघ्ने तत्र सात्यकिः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तथा हय़सहस्रैश्च तुमुलं सर्वतोऽकरोत् ||
२५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
तथा हय़ा हय़ारोहैस्ताडिताः प्रासतोमरैः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
तथाकरोद्वाक्यमदीनचेतनः; श्रिय़ं च दीप्तां वुभुजे सवान्धवः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
तथाकृतात्मा सहजैर्दोषैर्नश्यति राजसैः ||
२७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तथागच्छद्धृषीकेशः कृत्स्नं विस्मापय़ञ्जगत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तथागतं च यो हन्यान्नासौ पापेन लिप्यते |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
तथागतं तत्र न जज्ञिरे जना; वहिश्चरा वाप्यथवान्तरेचराः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महावलः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तथागतं तु सम्प्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत्स पार्थिवः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तथागतां तु तां दृष्ट्वा वेपमानां कृताञ्जलिम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
तथाग्नौ ते परीत्ताश्च त्वय़ा हि मम संनिधौ |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
तथाङ्गदैर्निपतितैर्व्यराजत वसुन्धरा |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तथाङ्गवङ्गौ सह पुण्ड्रकेण; पाण्ड्योड्रराजौ सह चान्ध्रकेण ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाचरितमार्येण त्वय़ास्मिन्सत्समागमे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
तथाज्ञप्तास्तु ते सर्वे पाण्डवेन महात्मना |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तथाति पुरुषानन्यान्त्सारुकौ यमजावुभौ |
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तथातिकृष्णवर्णां च वर्णोत्कृष्टां च वर्जय़ेत् ||
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
तथात्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तथात्मानं समादध्याद्भ्रश्येत न पुनर्यथा ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते; तस्माच्छिवे नाभिनन्दामि दाय़म् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंस्यूय़ते सदा ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
तथाद्यावासय़िष्यामि गुरुपत्न्याः कलेवरम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
तथानङ्गशराकारान्सहकारान्मनोरमान् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
तथानड्वाहं व्राह्मणाय़ प्रदाय़; दान्तं धुर्यं वलवन्तं युवानम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
तथानड्वाहं व्राह्मणाय़ाथ धुर्यं; दत्त्वा युवानं वलिनं विनीतम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तथानपत्यस्य सतः पुण्यलोका दिवि श्रुताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तथानुकम्पमानेन यज्वनाथामितौजसा |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तथानुजीविनो भृत्यान्संश्रितानतिथीनपि |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तथानुशिष्टः प्रय़यौ द्रुपदेन महात्मना |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तथानुय़ान्ति संरव्धाः पाञ्चाला युद्धदुर्मदाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
तथान्तो विहितस्तेन स्वय़मेव महात्मना ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
तथान्यन्नाशुभं किञ्चिन्न व्याधिस्तत्र न क्लमः ||
५ ग
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तथान्यानपि निघ्नन्तं युय़ुधानं समन्ततः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तथान्यानपि स प्राह राजकोशहरान्सदा |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तथान्यान्नृपतीन्वीराञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
तथान्यान्पाण्डुपुत्राणां समाय़ातान्महारथान् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तथान्यान्पुरुषव्याघ्रांस्तस्मिंस्तस्मिन्न्ययोजय़त् ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
तथान्याय़्यमुपस्थातुं जिह्मेनाजिह्मचारिणः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तथान्ये पुरुषव्याघ्राः परैर्विनिहता युधि |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
भीम उवाच
तथान्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
तथान्ये वृष्णिशार्दूला नाम चास्याकरोत्प्रभुः |
९ क