अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यमावर्तय़ितुं व्रह्मचारिव्रतादृते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
कुलपतिरु उवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
न शक्यमेतत्कवचं वाणैर्भेत्तुं कथञ्चन |
१३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यसे चालय़ितुं स्वभावात्पार्थ हेतुभिः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
न शक्या धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वय़म् ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न शक्या युधि निर्जेतुं त्वदन्येन परन्तप ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंय़ताः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
न शक्याः परिसङ्ख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
न शक्याः पाण्डवा जेतुं सेन्द्रैरपि सुरासुरैः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
न शक्याः पाण्डवास्तात युद्धे जेतुं कथञ्चन ||
३९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं त्वय़ा ह्यस्मिन्रणे हताः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हतास्मिन्रणाजिरे ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
न शक्यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न शक्यो निर्गुणस्तात गुणीकर्तुं विशां पते |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
न शक्यो मामको हन्तुं यो मे स्याद्वाणगोचरे ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
न शक्यौ युधि संरव्धौ जेतुमेतौ महारथौ |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
न शक्रभवने पुण्ये दिवि तद्विद्यते सुखम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
न शक्ष्यसि तदा शक्र निय़न्तुं शोकमात्मनः ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तुं जीवन्कथञ्चन ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
न शङ्खलिखितां वृत्तिं शक्यमास्थाय़ जीवितुम् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद्रणे स्थितम् |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
न शत्रुं तात पश्यामि समरे यो जय़ेत माम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
न शत्रुरङ्कमापन्नो मोक्तव्यो वध्यतां गतः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्वलोऽपि वलीय़सा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन्नष्टे प्रणश्यति |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
न शर्म प्राप्स्यसे राजन्नुत्क्रम्य सुहृदां वचः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
न शर्म लेभिरे राजन्विशमानास्ततस्ततः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
न शर्म लेभे देवेन्द्रो दीपितस्तस्य तेजसा |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
न शव्दवन्नापि च गन्धवत्त; न्न रूपवत्तत्परमस्वभावम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
न शव्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
न शशाक च सा राजन्प्रत्युत्थातुमनिन्दिता |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
न शशाक ततो गन्तुं वलवानपि संय़ुगे ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक द्वितीय़ं सा प्रत्याख्यातुमनिन्दिता |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक निय़न्तुं तं कामं कामवलात्कृतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
न शशाक निय़न्तुं तद्व्यासः प्रविसृतं मनः |
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक पुनर्घोरमस्त्रं संहर्तुमाहवे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक यदा वाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक विनिर्गन्तुं कौन्तेय़शरपीडितः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाक वृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
न शशाक समुद्वोढुं वज्रसारमय़ं शिशुम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
न शशाकात्मनात्मानमिय़ं धारय़ितुं धरा ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
न शस्त्रेण न वज्रेण न दिवा न तथा निशि ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
न शस्त्रेण न वज्रेण नाग्निना न च वाय़ुना |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
पितामह उवाच
न शाठ्येन न माय़ाभिर्लोको भवति शाश्वतः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
न शान्तिं लेभिरे तत्र रक्षसैर्भृशपीडिताः ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
न शान्तिमधिगच्छामि दुःखशोकसमाहतः |
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ ||
७ ख