शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
स्वाध्याय़ एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
युधिष्ठिर उवाच
स्वाध्याय़कृतय़त्नस्य व्राह्मणस्य पितामह |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४१
व्रह्मो उवाच
स्वाध्याय़क्रतुसिद्धानामेष लोकः सनातनः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़घोषसङ्घुष्टं मृगय़ूथशताकुलम् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़घोषो ज्याघोषो दीय़तामिति चैव हि ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़चारित्रगुणान्विताय़; तस्यापि लोकाः कुरुषूत्तरेषु ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
स्वाध्याय़ज्ञानय़ज्ञाश्च यतय़ः संशितव्रताः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़तपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान्समेष्यति ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
स्वाध्याय़दानव्रतपुण्ययोगै; स्तपोधना वीतशोका विमुक्ताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़नित्येषु द्विजेषु नित्यं; क्षत्रे च धर्माभिरते सदैव |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
स्वाध्याय़नित्योऽस्पृहय़न्परेषा; मेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्भवेत्सः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
स्वाध्याय़निरते विप्रे दत्त्वेह सुखमेधते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़निष्ठा ऋषय़ो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़परमैर्विप्रैर्व्रह्मघोषैर्विनादितः |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़मग्निसंस्कारमप्रमत्तोऽनुपालय़ |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़ममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने जने ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़यज्ञा ऋषय़ो ज्ञानय़ज्ञास्तथापरे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़यज्ञा ऋषय़ो ज्ञानय़ज्ञास्तथापरे ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़युक्ताः पुरुषाः क्रिय़ाय़ुक्ताश्च भारत |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़वन्तः शुचय़ो मधुराः प्रिय़वादिनः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
स्वाध्याय़वन्तः शुचय़ो महात्मानो यतव्रताः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़वन्तः सततक्रिय़ाश्च; धर्मप्रधानाश्च शुचिव्रताश्च |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वाध्याय़वर्जितः पापो लुव्धो नैकृतिकः शठः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़वान्धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रिय़ः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
स्वाध्याय़वान्वृत्तसमाधिय़ुक्तो; विभाण्डकः काश्यपः प्रादुरासीत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
स्वाध्याय़शीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
स्वाध्याय़शीला गुरुशुश्रूषणे रता; स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसन्धाः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
स्वाध्याय़समुपेतेभ्यः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
स्वाध्याय़ाढ्यं शुद्धय़ोनिं प्रशान्तं; वैतानस्थं पापभीरुं कृतज्ञम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ाढ्यो योऽतिमात्रं तपस्वी; वैतानस्थो व्राह्मणः पात्रमासाम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
स्वाध्याय़ाभ्यसनं चैव वाङ्मय़ं तप उच्यते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
स्वाध्याय़ार्थे समारम्भो ममाय़ं पाकशासन |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़िनो भिक्षवश्च सजपा वनवासिनः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
स्वाध्याय़िनो व्राह्मणा भिक्षवश्च; तपस्विनो ये च नित्या वनेषु |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
स्वाध्याय़े चाप्रमत्तो वै तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़े तपसि दमे च नित्ययुक्तः; क्षेमार्थी कुशलपरः सदा यतस्व ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़े भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़े भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
स्वाध्याय़ेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ेन विय़ुक्तो हि व्रह्मवर्चसवर्जितः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ेनान्वितं राजन्नरण्ये संशितव्रतम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वाध्याय़ेनापि महता वभूवुः पूरिता दिशः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ेनैव माहात्म्यं विमलं प्रतिपत्स्यथ ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
स्वाध्याय़ैस्तु महत्पापं तरन्ति गृहमेधिनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ो व्रतचर्या च व्राह्मणानां परं धनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
स्वाध्याय़ोऽध्यापनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
स्वानन्योऽथ परानन्यो जघान निशितैः शरैः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्वानप्याददते स्वाश्च शूराः समरदुर्जय़ाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वानमात्यान्विसृज्याथ विविक्ते तामुवाच सः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वानि कर्माण्यपाहाय़ शूद्रकर्माणि सेवते ||
१३ ख