chevron_left  तत्रarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
तत्र त्वेवंविधा वृत्तिर्लोके सत्यानृता भवेत् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद्भवति भारत ||
७७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलाय़ुधः |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दत्त्वा वहु द्रव्यं पूजय़ित्वा तथा द्विजान् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दत्त्वा वहून्दाय़ान्विप्रान्सम्पूज्य माधवः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दत्त्वा हलधरो विप्रेभ्यो विविधं वसु |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
तत्र दस्युर्धनय़ुतः सर्ववर्णविशेषवित् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
तत्र दाता निहन्तव्यः क्षत्रिय़ेण विशेषतः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दानं ददुर्वीरा व्राह्मणानां सहस्रशः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दानपतिर्धीमानाजगाम महाय़शाः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
तत्र दानफलं पुण्यमिह चामुत्र चाश्नुते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
तत्र दानेन भिद्यन्ते गणाः सङ्घातवृत्तय़ः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा लोमहर्षणम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपाय़नः प्रभुः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
तत्र दिव्यानभिप्राय़ान्ददर्श कुशिकस्तदा ||
२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
तत्र दिव्यानि पद्मानि पञ्चवर्णानि भारत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत्पवनस्तथा |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
तत्र दिव्यान्यरण्यानि दिव्यानि भवनानि च |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसस्तथा |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
तत्र दीर्घाय़ुरुत्पन्नः स नरः सुखमेधते ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रय़तेत विचक्षणः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृतः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दुर्योधनो राजा शूरान्वुद्धिमतो नरान् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दृष्ट्वा तु राजानं कौरव्यं धृतराष्ट्रजम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवगणा राजन्गन्धर्वासुरराक्षसाः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे चैव महर्षय़ः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
तत्र देवगणाः साध्याः समभूवन्महावलाः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
तत्र देवर्षिवर्येण नारदेनानुकीर्तितः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
कण्व उवाच
तत्र देवर्षिसदृशीं पूजां प्राप स नारदः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
तत्र देवर्षय़ः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तत्र देवर्षय़ः सिद्धाश्चारणाश्च समागताः |
८१ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
तत्र देवस्तय़ा सार्धं रेमे राजञ्जलेश्वरः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र देवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रय़तमानसः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवा निजघ्नुर्यान्दानवान्युधि सङ्गतान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
तत्र देवाः प्रय़च्छन्ति राज्यानि च धनानि च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषय़श्च समागताः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वा मासि मासि जनेश्वर |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वाः पितरश्चाव्रुवन्नृप |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्च सहर्षिभिः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तत्र देवाः स्म भाषन्ते चारणाश्च समागताः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
तत्र देवाः स्वय़ं दीप्ता भास्वराश्चाग्निवर्चसः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तत्र देवाधिदेवस्य कुमार्यो रमय़न्ति तम् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवान्पितॄंश्चैव तर्पय़न्तः पुनः पुनः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवान्पितॄन्विप्रांस्तर्पय़ित्वा पुनः पुनः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवास्त्रय़स्त्रिंशत्तिष्ठन्ति सहवासवाः |
८ क