द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद समरे वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सर्वमर्मज्ञः कामरूपो दुरासदः ||
५८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सहसा धन्वी धनुस्तस्य महात्मनः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सहसा राजन्नसम्भ्रान्तो वरासिना ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सहसा राजन्वाहूनथ शिरांसि च ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
चिच्छेद सहसा रामो वाहुशाखमिव द्रुमम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सारथेः काय़ाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद साय़कैस्तेषां ध्वजांश्चैव धनूंषि च ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद सुमहच्छूलं तेन वाणेन वेगवत् ||
५८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदाथान्यदादत्त द्रौणिर्घोरतरं धनुः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदाथासिना कार्ष्णिश्चर्मणा संरुरोध च ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदादिश्य सङ्ग्रामे ध्वजं हेमविभूषितम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदान्येन भल्लेन धनुरस्य महाप्रभम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदामित्रवीराणां समरे प्रतिय़ुध्यताम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
चिच्छेदेन्द्रध्वजाकारौ शिरश्चान्येन पत्रिणा ||
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
चिच्छेदैकेन भूय़श्च हस्ताच्चापमथाहरत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
चितचैत्यो महातेजा धर्मं प्राप्य च पुष्कलम् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
चिता रत्नैर्वहुविधैः कुरुराजस्य पाण्डव ||
२९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
चितां कृत्वा सुमहतीं प्रदाय़ च हुताशनम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
चितां चक्रुर्महात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा |
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
चिताः कृत्वा प्रय़त्नेन यथामुख्यान्नराधिपान् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
चिताधूमेन नीलेन संरज्यन्ते च पादपाः |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
चितासहस्रैर्निचितं वर्मशस्त्रसमाकुलम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
चितोऽग्निरुद्वहन्यज्ञं पक्षाभ्यां तान्प्रवाधते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
चित्तं ग्रसति सङ्कल्पस्तच्च ज्ञानमनुत्तमम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संय़तः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
चित्तं प्रसादय़ामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान् ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे; न चान्यदत्रौषधमद्य मे मतम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
चित्तप्रमथने युक्ताः सिद्धानां पद्मलोचनाः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
चित्तप्रमाथिनी वाला देवानामपि सुन्दरी ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
चित्तप्रसादेन यतिर्जहाति हि शुभाशुभम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
चित्तभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
चित्तमिन्द्रिय़सङ्घातं मनो वुद्धिं तथाष्टमीम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
चित्तमिन्द्रिय़सङ्घातात्परं तस्मात्परं मनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
चित्तमेकादशं विद्धि वुद्धिर्द्वादशमी भवेत् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
चित्तमोहमिवाय़ुक्तं भार्गवस्य महामतेः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
चित्तवैकल्यमासाद्य सा सा वुद्धिः प्रजाय़ते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
चित्तिः स्रुक्चित्तमाज्यं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
चित्रं कार्मुकमादत्त शरांश्च निशितान्दश ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
चित्रं शरासनं सङ्ख्ये शरैर्विव्याध ते सुतान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
चित्रं शीघ्रतरत्वाच्च चरन्तमसिधारिणम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
चित्रं सम्प्रेक्ष्य निहतं तावका रणशोभिनः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
चित्रः सूक्ष्मः सुकृतो यादवस्य; अस्त्रे योगो वृष्णिसिंहस्य भूय़ान् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
चित्रकाञ्चनसंनाहैः सदश्वैर्वेगवत्तरैः ||
८३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
चित्रकाञ्चनसंनाहैर्वाजिमुख्यैर्विशां पते |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
चित्रकार इवालेख्यं कृत्वा मा स्म विनाशय़ |
२२ ख