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कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न चेदस्त्राणि निर्णेशुः स कथं निहतः परैः ||
७३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
न चेदादास्यते वालो दिष्टस्य वशमेष्यति ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
न चेदिदं कर्म नरेषु वद्धं; न विद्यते पुरुषस्य स्वकर्म |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
न चेदिमं पुरुषं कर्मवद्धं; न चेदस्मान्मन्यतेऽसौ विशिष्टान् |
८८ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
अष्टक उवाच
न चेदेकैकशो राजँल्लोकान्नः प्रतिनन्दसि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
भीष्म उवाच
न चेदेवं करिष्यामो यदय़ं व्राह्मणोऽव्रवीत् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
न चेदेवं प्राप्तकालं वचो मे; मोहाविष्टः प्रतिपत्स्यस्यवुद्ध्या |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
न चेद्ग्रहीष्यसे राजञ्शपिष्ये त्वां न संशय़ः ||
१०९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
न चेद्ग्रहीष्यसे वाक्यं श्रोतासि सुवहून्हतान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
न चेद्दर्शय़िता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
न चेद्दाता भवेद्दाता कुतः स्युर्मोक्षकाङ्क्षिणः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
न चेद्धर्तव्यमन्यस्य कथं तद्धर्ममारभेत् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
न चेद्धर्मं स चरति नरकाय़ैव गच्छति ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
न चेद्भागं कुरवोऽन्यत्र युद्धा; त्प्रय़च्छन्ते तुभ्यमजातशत्रो |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
न चेद्युधिष्ठिरं वीर पालय़ेदर्जुनो युधि |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
न चेद्राज्यं मुञ्चति धार्तराष्ट्रो; युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
न चेद्वचः श्रोष्यसि मे नराधिप; ध्रुवं प्रतप्तासि हतोऽरिभिर्युधि |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
न चेद्वधभय़ाद्भीतो धार्तराष्ट्रान्प्रहास्यति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
न चेद्वाञ्छसि तद्द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्तताम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
अर्जुन उवाच
न चेद्विजित्य गास्तास्त्वं गृहान्वै प्रतिय़ास्यसि |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
न चेद्विधेरय़ं कालः प्राप्तः स्यादद्य पश्चिमः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
धृतराष्ट्र उवाच
न चेद्वेदा वेदविदं शक्तास्त्रातुं विचक्षण |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
न चेन्द्रिय़व्युपरमे मनस्युपरमो भवेत् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
न चेन्द्रिय़ाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
न चेन्मोघं विप्रलप्तं मय़ेदं; पथ्यं मुमूर्षोरिव सम्यगुक्तम् ||
१३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
कर्ण उवाच
न चेमान्पुरुषव्याघ्र सिंहनादान्विशक्ष्यते ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या दारा रक्ष्याश्च सर्वशः |
१३० क
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
न चेह स्थातुमिच्छामि लोके कृष्णविनाकृतः ||
१४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेतद्व्रवीमि वः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
न चेय़ं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभिः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
न चेय़ं व्राह्मणी वृद्धा शिशुरेवात्र कारणम् ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३०
दुर्योधन उवाच
न चैकः स समर्थोऽस्मान्पाण्डवार्थे प्रवाधितुम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
न चैकत्र चिरासक्तो न चैकग्रामगोचरः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
न चैकस्मिन्रमन्त्येताः पुरुषे पाण्डुनन्दन ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न चैकेन परिव्राज्यं न गन्तव्यं तथा निशि |
१३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
न चैतच्छक्यते ज्ञातुं को न वध्येदिति प्रभो |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
जनमेजय़ उवाच
न चैतत्कारणं व्रह्मन्नल्पं वै प्रतिभाति मे |
५ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
न चैतत्साधु यद्राजन्पाण्डवास्त्वां नृपोत्तम |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
न चैतदद्भुतं कृष्ण मित्रार्थे यच्चिकीर्षसि |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
न चैतदनुरूपं ते यत्ते ग्लानिररिन्दम |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न चैतदभिजानामि चिन्तय़न्नपि सर्वथा ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
न चैतदशकत्स्थानात्सञ्चालय़ितुमच्युत ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
न चैतदिष्टं कौन्तेय़ यदन्येन फलं कृतम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यै रूपनिवर्तनम् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथञ्चन ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १३५
यवक्रीरु उवाच
न चैतदेवं क्रिय़ते देवराज ममेप्सितम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
न चैतदेवं द्रष्टव्यमसाध्यमिति किञ्चन ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
अर्जुन उवाच
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीय़ो; यद्वा जय़ेम यदि वा नो जय़ेय़ुः |
६ क