वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
चरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
चरन्तं च तथा दृष्ट्वा भीमसेनमरिन्दमम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संय़तेन्द्रिय़म् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् |
१५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
चरन्तं विविधान्मार्गान्मण्डलानि च सर्वशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
चरन्तं व्राह्मणं कञ्चित्कल्यचित्तमनामय़म् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
चरन्तं हंसरूपेण महर्षिं संशितव्रतम् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
चरन्तमजने शल्य व्राह्मणात्तपसो निधेः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
चरन्तमरिसङ्घेषु कालं क्रुद्धमिवान्तकम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
चरन्तस्त्वसिमार्गांश्च धनुर्मार्गांश्च शिक्षय़ा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवाधिसंहताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्ति धर्मं पुण्येऽस्मिंस्त्वय़ा गुप्ता धृतव्रताः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
चरन्ति लोके प्रच्छन्नाः क्व नु तेऽद्य महारथाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वावदूका वहुश्रुताः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
चरन्ति विधिदृष्टं तदृतुकालाभिगामिनः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
चरन्ती शष्पमुख्यानि तिक्तानि मधुराणि च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
चरन्ती हरिणैः सार्धं मृगीव वनचारिणी |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
चरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ति नय़नप्रभाम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्तु देशान्संवीताः स्फीताञ्जनपदाकुलान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्तो मृगय़ां नित्यं शुद्धैर्वाणैर्मृगार्थिनः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
चरन्तौ विविधान्मार्गान्मण्डलानि च भागशः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
चरन्तौ विविधान्मार्गान्हार्दिक्यशिनिपुङ्गवौ |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्त्या निय़मांस्तांस्तान्स्त्रीभिस्तीव्रान्सुदुश्चरान् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
चरन्दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
चरन्नभीतवत्सङ्ख्ये निहतः सव्यसाचिना ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्नैःश्रेय़सं धर्मं प्रजापालनकारितम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
चरन्भैक्षं मुनिर्मुण्डश्चरिष्यामि महीमिमाम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
चरन्भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपय़िष्ये कलेवरम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
चरन्मध्यन्दिनार्काभस्तेजसा व्यदहद्रिपून् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
चरन्मध्यन्दिने सूर्यः प्रतपन्निव दुर्दृशः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
चरन्मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वय़म्भुवः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्मार्गान्विजानाति नक्षत्रैर्विन्दते दिशः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चरन्वेगेन महता समुद्रमपि शोषय़ेत् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
चरन्स विविधान्मार्गान्रथेषु रथय़ूथपः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
चरमं संविशति या प्रथमं प्रतिवुध्यते |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
चरमचरमपीदं यत्परं चापि तस्मा; त्तदपि मम रिपुं तं रक्षितुं नैव शक्ताः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
चरमाणावय़ुध्येतां रथशिक्षाविशारदौ ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
चरस्व धर्मं कौन्तेय़ श्रेय़ान्यः प्रेत्य भाविकः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
चरस्व पापं पश्चाद्वा पूर्वं वा त्वं यथेच्छसि ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
चराचरं जगत्सर्वं सिंहनादमथाकरोत् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा सञ्छादितौ शरैः ||
११४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्तारमेव च ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
चराचरा नरश्रेष्ठ इत्येवमनुशुश्रुम ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
चराचराणां भूतानां रक्षामपि च सर्वशः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
चराचराणां भूतानां विदितप्रभवाप्ययम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषान्वितः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा सुवृषो गोवृषेश्वरः ||
१३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
चराचरैस्त्रिभिर्लोकैर्योऽजय़्यो रथिनां वरः ||
२५ ग