chevron_left  चित्रोपचित्रौarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रः शरासनः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
चित्रोपलां चित्रवर्हां मञ्जुं मकरवाहिनीम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
चित्रय़ोधी च नकुलो महेष्वासो महावलः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
चित्रय़ोधी च शक्तश्च मतो मे रथपुङ्गवः ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
चित्वा दारुभिरव्यग्रः प्रभूतैः स्नेहतापितैः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं न्वेतद्भविष्यति ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
चिन्ता मे वर्धते तीव्रा मुमूर्षा चापि जाय़ते ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्ता सुमहती जाता मुनिं दृष्ट्वा महाद्युतिम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
चिन्तां परमिकां भेजे सन्तप्त इव चाभवत् ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तागता ये च देवेषु मुख्या; ये चाप्यन्ये देवताश्चाजमीढ |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रिय़चेतनः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
चिन्तामपरिमेय़ां च प्रलय़ान्तामुपाश्रिताः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
चिन्तामभ्यगमत्तीव्रां निशश्वास च पार्थिवः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तामभ्यगमद्वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
चिन्तासंमूढहृदय़ं वागुवाचाशरीरिणी ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्ताय़ज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
चिन्तितं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात्तदा ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
चिन्त्यं वहु महाराज कृत्यं यत्तत्र मे शृणु |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
चिन्त्यतामिदमेवाग्रे मम निःश्रेय़सं परम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूय़श्चापि प्रवर्धते ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूय़श्चापि विवर्धते ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
स्नुषो उवाच
चिन्त्या ममेय़मिति वा सक्तूनादातुमर्हसि ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
चिन्त्यैवं नैषधो राजा सभां पर्यचरत्तदा ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
जरासन्ध उवाच
चिन्तय़ंश्च न पश्यामि भवतां प्रति वैकृतम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
चिन्तय़ंश्च न पश्यामि राजंस्तव सुहृत्तमम् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
चिन्तय़ंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ंश्च महातेजा गुणान्रामस्य वीर्यवान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १५
सूत उवाच
चिन्तय़त्सु सुरेष्वेवं मन्त्रय़त्सु च सर्वशः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ध्वं लोकहितं यथाधीकारमीश्वराः ||
६० ग
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्तः क्षय़ं तीव्रं निद्रां नैवोपलेभिरे ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्तश्च पार्थानां तान्क्लेशान्द्यूतकारितान् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्तस्तमेवार्थं नालभन्त सुखं क्वचित् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़न्ति सदा वीर कीदृशोऽय़ं भविष्यति ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्ती वहुविधं हृदय़ेन विदूय़ता ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़न्तो भवेदद्य लोकानां स्वस्त्यपीत्यह ||
११५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्न लभे निद्रामहःसु च निशासु च ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
चिन्तय़न्नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
चिन्तय़न्नानुपर्येति त्रिभिरेवान्वितो गुणैः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
चिन्तय़न्मुमुदे राजा सहवार्ष्णेय़सारथिः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्राजसूय़ाप्तिं न लेभे शर्म भारत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़न्स महावाहुर्भ्रातॄणां दुःखमुत्तमम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
चिन्तय़ानः क्षमं दाने राज्ञां वै शुल्कतोऽगमत् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ानः स धर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाव्रवीत् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किञ्चन |
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ानो महाभागां गान्धारीं तपसान्विताम् |
१० क
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
चिन्तय़ानो यदूनां च कृष्णस्य च यशस्विनः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ाभिपरीताङ्गो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
७ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् |
२२ क