स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
तदैव वध्यः पाण्डूनां जनार्दन जय़द्रथः ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् |
१९५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
तदैवाज्ञासिषमहं नेय़मस्तीति भारती ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
तदैवाविशदत्युग्रो ज्वरो मे मुनिसत्तम |
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
तदैवास्मादुद्विजते सर्पाद्वेश्मगतादिव ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
तदैवास्य प्रसीदन्ति सर्वार्था नात्र संशय़ः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तदैवास्य भय़ं तेभ्यो जाय़ते पश्य यादृशम् ||
१४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
तदैवाहं वचः श्रुत्वा भवद्भ्यामनुसंमतम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तदैवैष हतः पापो यदैव निरपत्रपः |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
तदैवोक्तास्मि मा स्नेहं कुरुष्वात्मसुतेष्विति ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
तदैषोऽन्यत्वतामेति न च मिश्रत्वमाव्रजेत् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
तदौषधं पथ्यमिवातुरस्य; न रोचते तव वैचित्रवीर्य ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
तदौषधैश्च मन्त्रैश्च प्राय़श्चित्तैश्च शाम्यति ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तद्गच्छ |
९८ ग
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्गच्छ विपुलप्रज्ञ भ्रातुः प्रिय़हिते रतः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तद्गच्छापचितिं राजन्पितुस्तस्य महात्मनः ||
१८६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तद्गजाश्वरथौघानां रुधिरेण समुक्षितम् |
१३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
तद्गत्वा कालविषय़ाद्विमुक्ता मोक्षमाश्रिताः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तद्गत्वा तं महात्मानं यदि ते रोचतेऽर्जुन |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
तद्गरीय़स्तरं मन्ये यत्र कृष्णधनञ्जय़ौ |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्गृहाण विनास्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्गृहीत्वा धनुःश्रेष्ठं ननाद वलवांस्तदा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
तद्गृह्णीष्वाविचारेण यदि सत्ये स्थितो भवान् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तद्गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथकुञ्जरम् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तद्गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथय़ूथपम् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
तद्गोत्रवर्णतस्तस्य कुर्यात्संस्कारमच्युत ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
तद्घोरं महदाश्चर्यं सर्वे प्रैक्षन्समन्ततः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
तद्घोरमभवद्युद्धं तस्य तेषां च भारत ||
५२ ग
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
तद्दण्डं धारय़त मे दुष्कृतेरकृतात्मनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
तद्दण्डविन्नृपः प्राज्ञः शूरः शक्नोति रक्षितुम् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
तद्दत्त्वातिथिभृत्येभ्यो राजञ्शेषेण जीवसि ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
तद्दर्शय़ मय़ि क्षिप्रं यदि जातोऽसि पाण्डुना ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तद्दर्शय़ रणे सर्वं जहि चैनं महारथम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तद्दर्शय़ित्वा स शुकं मन्त्री काननमुत्तमम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
तद्दारग्रहणे यत्नं सन्तत्यां च मनः कुरु |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दारहरणं प्राप्तमस्माभिरवितर्कितम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
तद्दाव इव निर्दह्यात्प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दिदृक्षसि चेद्राजन्द्रष्टास्यद्य न संशय़ः ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तद्दिव्यं भार्गवो मह्यमददाद्धनुरुत्तमम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
तद्दुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमश्नुते ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
तद्दुःखमतितिक्षाम मा वधीष्म कुरूनिति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
तद्दुःखमतितिक्षाम मा वधीष्म कुरूनिति ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा कर्म पार्थस्य द्रौणिराहवशोभिनः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा कर्म सङ्ग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मणः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा कुरवस्तत्र विक्रान्तं सव्यसाचिनः |
३३ क