शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
चिराय़ते च सन्तापाच्चिरं स्वपिति वारितः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
चिराय़माणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुषादकः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
चिराय़माणे त्वय़ि च चिरमस्मि सुदुःखितः ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
चिराय़माणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
चिरिविल्वय़ुतं पुण्यं पनसार्जुनसङ्कुलम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
चिरेण निश्चय़ं कृत्वा चिरं न परितप्यते ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
चिरेण मित्रं वध्नीय़ाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
चिरोषिताविहावां वै वृक्षेऽस्मिन्विदितं हि ते ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
चिह्नभूतानि जगतो विनाशार्थाय़ भारत ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
चिह्नभूतो विभूत्यर्थमय़ं धात्रा विनिर्मितः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
चिह्नमात्रेण भीष्मं तु प्रजज्ञुस्तत्र कौरवाः |
५८ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
चीचीकूचीति वाश्यन्त्यः सारिका वृष्णिवेश्मसु |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
चीनांस्तुखारान्दरदान्सदार्वा; न्देशान्कुणिन्दस्य च भूरिरत्नान् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
चीनान्हूणाञ्शकानोड्रान्पर्वतान्तरवासिनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
चीरधारणमाकाशे शय़नं स्थानमेव च |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
चीरवल्कलभृद्राजन्गान्धार्या सहितोऽनय़ा |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
चीरवल्कलवासोभिर्वासांस्याभरणानि च ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
चीरवल्कलसंवीते वासांस्याभरणानि च ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
चीरवल्कलसंवीतैर्मृगचर्मनिवासिभिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
चीरवासा विल्वदण्डी दीर्घश्मश्रुनखादिमान् |
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
चीरसंवृतगात्राश्च तथा फलकवाससः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
चीराणि तस्याद्भुतदर्शनानि; नेमानि तद्वन्मम रूपवन्ति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
चीरैः परिवृतस्तस्मिन्मध्ये छन्नः कुशैस्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेय़ुर्येऽपि कर्षकाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
चीर्णव्रतो भवेद्विप्रो दृष्टमेतत्पुरातने ||
१३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
चीर्त्वा द्वादश वर्षाणि दीक्षामेकां मनोगताम् |
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
चीर्त्वा द्वादश वर्षाणि दीक्षामेकां मनोगताम् |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
चीर्त्वा द्वादश वर्षाणि राजा भवति पार्थिवः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
चुकोप भार्गवश्चापि महेन्द्रस्य महातपाः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
चुकोप वलिनां श्रेष्ठो भीमसेनः प्रतापवान् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चुकोप समरे द्रौणिर्दण्डाहत इवोरगः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
चुकोपय़िषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुधुः समरे राजन्पादस्पृष्टा इवोरगाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तत्र भारत पार्थिवाः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति राजन्दुर्योधनेति च |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः परन्तप ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
चुक्रुशुः कौरवाः सर्वे भृशं शोकपराय़णाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः पाण्डवा राजन्वस्त्राणि दुधुवुश्च ह ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः सर्वतो योधाः साधु साध्विति भारत ||
७१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुः सिंहनादांश्च वासांस्यादुधुवुश्च ह ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुर्दानवाश्चापि दिक्षु सर्वासु भैरवम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादय़ः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
चुक्रुशुर्भय़भीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुश्च निपेतुश्च वभ्रमुश्चापरे दिशः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुस्ते नरव्याघ्र यथाप्राग्वा नरोत्तमाः ||
४१ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
चुक्रोध भगवान्रुद्रो लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
चुक्रोध यक्षाधिपतिर्युज्यतामिति चाव्रवीत् ||
२२ ख