भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चक्ररक्षौ तु भीमस्य माद्रीपुत्रौ महाद्युती |
२० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चक्ररत्नं तु यत्कृष्णे स्थितमासीन्महात्मनि |
३८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
चक्रवत्कर्मणां तात पर्याय़ो ह्येष नित्यशः ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
चक्रवत्परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यज्ञानाज्जन्तवो भृशम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
चक्रवत्परिवर्तेत तत्ते जानाति दुष्कृतम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजय़ी नृपः ||
१३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
चक्रवाकप्रय़ुक्तेन विमानेन स गच्छति |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रवाकांश्च भद्रं ते प्रजज्ञे सा तु भामिनी ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
चक्रव्यूहं महावाहो पञ्चमोऽन्यो न विद्यते ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
चक्रव्यूहस्य न वय़ं विद्म भेदं कथञ्चन ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
चक्रव्यूहो महाराज आचार्येणाभिकल्पितः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
चक्राङ्कितकरः श्रीमान्महामूर्धा महावलः |
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चक्राणां पततां चैव युगानां च धरातले |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
चक्राणि च क्षुरान्तानि मण्डलानीव भास्वतः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
चक्राणि चानेकशतक्षुराणि; प्रादुर्वभूवुर्ज्वलनप्रभाणि ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
चक्राणि चापविद्धानि मुद्गरांश्च वहून्रणे ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
चक्राणि परिघांश्चैव त्रिशूलानि परश्वधान् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
चक्राणि विशिखाः प्रासा विविधान्याय़ुधानि च |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
चक्राण्यश्वांस्तथा वाहान्यद्यत्पश्यति भूतले |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
चक्राते द्रोणपाञ्चाल्यौ नृणां शीर्षाण्यनेकशः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चक्रातेऽत्यद्भुतं युद्धं परस्परवधैषिणौ ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु; सर्वैश्च देवैरृषिभिश्च जुष्टः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
चक्राय़ुधेन चक्रेण पिवतोऽमृतमोजसा ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुः प्रदक्षिणं सर्वे वत्सा इव निवारणे ||
४८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव ते ||
१४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
चक्रुः सम्वाधमाकाशमुच्छ्रितेन्द्रध्वजोपमैः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुः सर्वाः क्रिय़ास्तत्र पुरुषा विदुरादय़ः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुः साङ्ग्रामिकं सर्वं विराटश्च महीपतिः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां सङ्ख्या न विद्यते ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
चक्रुः स्म तादृशं कर्म यादृशं वै कृतं रणे ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
चक्रुरार्तस्वरं घोरं पर्जन्यनिनदोपमम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चक्रुरार्तस्वरं घोरं व्यद्रवन्त दिशो दश ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति दुःखिताः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चक्रुरार्तस्वरं घोरमुत्पातजलदा इव ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय़ दुष्करम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
चक्रुर्नादान्वहुविधान्कम्पय़न्तो वसुन्धराम् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
चक्रुर्नानाविधाश्चेष्टाः सिंहासनगतास्तदा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
चक्रुर्निशां सन्धिगतां समीक्ष्य; विभावसोर्लोहितराजिय़ुक्ताम् ||
१२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
चक्रुर्वादित्रनिनदान्सिंहनादरवांस्तथा ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
चक्रुर्वाहुवलं चैव तथा चेलवलं महत् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
चक्रुश्च नानाविधवाद्यशव्दा; न्निनादय़न्तो वसुधां समन्तात् ||
८७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुश्चैव महाराज भ्रातरस्त्रय़ एव ह ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
चक्रुस्तस्यां दय़ां केचित्पप्रच्छुश्चापि भारत ||
११२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुस्ते विधिवद्राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च ||
६ ख