द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मप्रसक्तेन सर्वमेतदनुष्ठितम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव स वीर्यवान् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
क्षत्रधर्ममनुष्ठाय़ धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्ममनुस्मृत्य युध्यस्व भरतर्षभ ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्ममपाश्रित्य त्वद्विधेन सुय़ोधन ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्ममवेक्षस्व श्लाघ्यस्तव वधो जय़ात् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मरतः पार्थ पितॄन्देवांश्च तर्पय़ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मरतः प्राज्ञः कथं नु प्रहरेद्रणे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मरतश्चापि कच्चिन्मोदसि पाण्डव ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
क्षत्रधर्मरता धन्या विदुरा दीर्घदर्शिनी |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मरतैः शूरैस्तावत्कुर्वन्ति कौरवाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मरतो मह्यं मतः परपुरञ्जय़ः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मरतौ वीरौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मसमाचारं तथ्यं चाख्याहि मे द्विज |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मस्य वेत्ता च वुद्धिसत्त्वगुणान्वितः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मस्य सम्प्राप्तः कालः सत्यपराक्रम |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मा च पाञ्चाल्यः क्षत्रवर्मा च मारिष |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मा तु राजेन्द्र मतो मेऽर्धरथो नृप |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नावृत्तिः पतति द्विजः |
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मा सिन्धुपतेश्छित्त्वा केतनकार्मुके |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
भीमसेन उवाच
क्षत्रधर्माच्च्युतो राज्ञि भवेय़ं शास्वतीः समाः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मादपक्रान्तः सुवृत्तश्चरितव्रतः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मादमेय़ात्मा नाकम्पत युधिष्ठिरः ||
५८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि संस्मर्तुमर्हसि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रधर्मान्न पापीय़ान्धर्मोऽस्ति भरतर्षभ |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
क्षत्रधर्मान्महावाहुर्नाकम्पत धनञ्जय़ः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
क्षत्रधर्माश्रिताः शूराः क्षत्रिय़ाः प्राप्नुवन्ति तान् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितं दृष्ट्वा मुचुकुन्दमसम्भ्रमम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितः पार्थ कथं नैनं हनिष्यसि ||
९० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्रधर्मे स्थिताः पार्था नापराध्यन्ति पुत्रकाः ||
६१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितिं ह्युक्त्वा तस्याश्चलितुमिच्छसि ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा यथाशास्त्रं यथाविधि |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा युध्यस्व पुरुषो भव ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समराय़ाजुहाव ह ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
कर्ण उवाच
क्षत्रधर्मे स्थितो ह्यस्मि स्वधर्मादनपेय़िवान् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मेण कौरव्य जितेय़मवनिस्त्वय़ा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालय़िष्यसि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ प्राप्य राज्यमनुत्तमम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
क्षत्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तय़न्ति गते युगे ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मो महारौद्रः शस्त्रनित्य इति स्मृतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मोऽत्र कौन्तेय़ तव धर्माभिरक्षणम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
क्षत्रभावादपगतो व्राह्मणत्वमुपागतः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
क्षत्रमुत्साद्य वीर्येण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रवन्धुरशक्तत्वाल्लोके स पुरुषाधमः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
क्षत्रवन्धूनिमान्प्राणैर्विप्रय़ोज्य पुनः पुनः ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रविट्शूद्रसङ्घाश्च वहवो भरतर्षभ ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
क्षत्रविद्यां समाश्रित्य हितमस्योपधारय़े |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रवीजं यदा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव |
११ क