chevron_left  चक्षुर्दिव्यंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
चक्षुर्दिव्यं समाश्रित्य द्रक्ष्यस्यमितविक्रम ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
चक्षुर्निमेषमात्रेण लघ्वस्त्रगतिगामिनी |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
चक्षुर्मनोभ्यां सन्तोष्या विप्राः सेव्याश्च शक्तितः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
चक्षुर्विषौ महावीर्यौ नित्यक्रुद्धौ तरस्विनौ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
चक्षुर्विषय़मापन्नः कथं मुच्येत जीवितः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
चक्षुर्विषय़सम्प्राप्तो न त्वं माधव मोक्ष्यसे |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
चक्षुर्विषय़सम्प्राप्तो न नौ मोक्ष्यति सैन्धवः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
चक्षुर्व्याधिं न लभते यज्ञभागमथाश्नुते ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
चक्षुर्हणं जय़े सक्तमिष्वासवररक्षितम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
चक्षुषः प्रभवस्तेजो नास्त्यन्तोऽथास्य चक्षुषाम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
व्राह्मणा ऊचुः
चक्षुषश्चात्मनो लाभात्त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो वलात् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
चक्षुषा गुरुमव्यग्रो निरीक्षेत जितेन्द्रिय़ः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
चक्षुषा न विषह्यं च यत्किञ्चिच्छ्रवणात्परम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
चक्षुषा यं प्रपश्यामि तस्य तेजो हराम्यहम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
चक्षुषा विप्रहीनस्य पङ्गुलस्य जडस्य वा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
चक्षुषा सञ्जय़ो राजन्दिव्येनैष समन्वितः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
चक्षुषी कृतवर्मा च गौतमश्चास्यतां वरः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
चक्षुषी च भरद्वाजः कृतवर्मा च सात्वतः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
सावित्र्यु उवाच
चक्षुषी च स्वराज्यं च द्वौ वरौ श्वशुरस्य मे |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
चक्षुषी नाम विद्येय़ं यां सोमाय़ ददौ मनुः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
चक्षुषी नासिकाकर्णौ त्वग्जिह्वेति च पञ्चमी |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
चक्षुषी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः |
१११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
चक्षुषी यत्र धर्मस्य यत्र चैष प्रतिष्ठितः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
चक्षुषी सहदेवश्च नकुलश्च महारथः |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा सन्ध्या पुनः स्मृता |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६९
धृतराष्ट्र उवाच
चक्षुष्मतां वै स्पृहय़ामि सञ्जय़; द्रक्ष्यन्ति ये वासुदेवं समीपे |
१ क
वन पर्व
अध्याय २८३
मार्कण्डेय़ उवाच
चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
चक्षुष्मन्तः प्रपश्यन्ति तथा तं ज्ञानचक्षुषः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
चक्षुष्मांश्च भविष्यसि |
७५ 5
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
चक्षुस्ते यदि न परप्रणेतृनेय़ं; धर्मे ते भवतु मनः परं निशम्य ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
चक्षूंषि प्रतिलभ्याथ प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
चक्षूंषि प्रतिहन्यन्ते सैन्येन रजसा तथा ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
चक्षूंषि सर्वभूतानां मोहय़न्तौ महावलौ ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहय़न्प्रजाः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
चङ्क्रम्यमाणः स तदा यवक्रीरकुतोभय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान्वहून् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
चङ्क्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
चङ्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
चचार काले विजय़ाय़ चारिहा; वशं च शत्रूननय़त्पुरन्दरः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
चचार गतभीः प्रीतो लव्धकीर्तिर्वरो नृषु ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
चचार च सतां धर्मं प्राप चानुत्तमं यशः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
चचार धन्वी वहुधा नरेन्द्रः; सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
सूत उवाच
चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसाय़ङ्गृहो मुनिः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
चचार पृथिवीं पाण्डुः सर्वां परपुरञ्जय़ः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
चचार पृथिवीं पापो घोरः शकुनिलुव्धकः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
चचार मण्डलान्येव गतप्रत्यागतानि च ||
३० ख