शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततो भूय़ो महाराज सहदेवः प्रतापवान् |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
ततो भूय़ो व्यगणय़त्स्ववुद्ध्या मुनिसत्तमः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमव्रवीत् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
ततो भेरीः समाजघ्नुः शङ्खान्दध्मुश्च दंशिताः |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो भेरीश्च शङ्खांश्च शतशश्चैव पुष्करान् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
ततो भेरीसहस्राणि शङ्खानामय़ुतानि च |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ततो भेर्यश्च पेश्यश्च क्रकचा गोविषाणिकाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
ततो भोजो नरव्याघ्रं दुःसहः कुरुसत्तम |
१८ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो भोज्यं च भक्ष्यं च पेय़ं चान्धकवृष्णय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
ततो भ्रान्ते रथे तिष्ठन्रामः प्रहरतां वरः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततो भय़ं प्रादुरासीत्प्रह्रादस्य महात्मनः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततो मचक्रुकं राजन्द्वारपालं महावलम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मण्डूकराट्तापसवेषधारी राजानमभ्यगच्छत् ||
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
ततो मत्स्याः केकय़ाश्च धनुर्वेदविशारदाः |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मत्स्यान्महातेजा मलय़ांश्च महावलान् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपं दृष्ट्वा तव पुत्राः पराङ्मुखम् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपं द्रौणिरभ्यधावत्तथाकृतम् |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपः क्रुद्धः शतेन नतपर्वणाम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपरथं कार्ष्णिः प्राप्यातिकोपनः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपो दृष्ट्वा विसञ्ज्ञं सूतनन्दनम् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
ततो मद्रेश्वरं राजा शरैः संनतपर्वभिः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
ततो मध्यमकक्षाय़ां ददर्श रथमास्थितम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमैः |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ततो मध्ये नरेन्द्राणामूर्ध्ववाहुर्हलाय़ुधः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
ततो मनसि संसज्य पञ्चवर्गं विचक्षणः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मनुजशार्दूलो योजय़ामास वाहिनीम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मन्त्रमकुर्वन्त ते समेत्य तपस्विनः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ततो मन्दाकिनीं रम्यामुपरिष्टादभिव्रजन् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ततो मन्दाकिनीतीरे क्रीडन्तोऽप्सरसां गणाः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
ततो ममात्मा यो देहे सोऽग्निर्भूत्वा विनिःसृतः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
ततो ममासीन्मनसि माय़ेय़मिति निश्चितम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
व्यास उवाच
ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सय़न्निव |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततो मरुत्वान्हरिभिर्युक्तैर्वाहैः स्वलङ्कृतैः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मय़ं चक्रिरे परम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मलय़मारुह्य पश्यन्तो वरुणालय़म् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महति पर्यङ्के मणिकाञ्चनभूषिते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः शप्तः सद्यो व्यनश्यत |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
ततो महर्षय़ः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरन्दरम् |
८२ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महर्षय़ः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महर्षय़ः सर्वे समुत्थाय़ जनार्दनम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महर्षय़ः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
ततो महात्मा तानाह दहनो व्राह्मणर्षभान् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महात्मा निय़मे स्थितात्मा; पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
ततो महात्मा यक्षेन्द्रः प्रत्युवाचानुगामिनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महात्मा यमजौ समेत्य; मूर्धन्युपाघ्राय़ विमृज्य गात्रे |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ततो महानभूच्छव्दो दिवि सर्वदिवौकसाम् |
१२ क