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उद्योग पर्व
अध्याय ११७
गालव उवाच
चतुर्थं जनय़त्वेकं भवानपि नरोत्तम ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
चतुर्थं तस्य धर्मस्य त्वत्संस्थं नो भविष्यति ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भागं स विन्दति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भारत विन्दति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भारत विन्दति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
चतुर्थं तस्य पापस्य राजा भारत विन्दति ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
चतुर्थं तस्य पापस्य राजा भारत विन्दति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
चतुर्थं तस्य पुण्यस्य राजा चाप्नोति भारत ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
चतुर्थं ध्यानमार्गं त्वमालम्व्य पुरुषोत्तम |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
चतुर्थं मतमस्माकं मनोः श्रुत्वानुशासनम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्थं लोकपालानां रक्षितारं महेश्वरम् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
श्रीरु उवाच
चतुर्थं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्थं सर्गमित्येतन्मानसं परिचक्षते ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
चतुर्थः पुष्पवान्नाम पञ्चमस्तु कुशेशय़ः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
चतुर्थः संवहो नाम वाय़ुः स गिरिमर्दनः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
चतुर्थभक्तक्षपणं वैश्यशूद्रे विधीय़ते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्तते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
चतुर्थमर्थमित्याहुः कवय़ो धर्मलक्षणम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
चतुर्थमस्या भागं हि मय़ोक्ताः सम्प्रतीच्छत ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
चतुर्थमापो विज्ञेय़ं जिह्वा चाध्यात्ममिष्यते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
चतुर्थमुक्तं परमाश्रमं शृणु; प्रकीर्त्यमानं परमं पराय़णम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
चतुर्थमेतद्विपुलं वैराटं पर्व वर्णितम् |
१३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
चतुर्थाष्टमकालश्च षष्ठकालिक एव च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्पराय़िकी |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
चतुर्थे चाय़ुषः शेषे वानप्रस्थाश्रमं त्यजेत् |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते मासि पूर्णे ततः परम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते स्वय़ं भर्तारमर्जय़ेत् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
चतुर्थे निय़ते काले कदाचिदपि चाष्टमे |
१० क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
चतुर्थे समभिक्रान्ते प्रथमे दिवसे गते |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
चतुर्थेनाप्यथांशेन वुद्धिमान्सुखमेधते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति सञ्चिन्त्य भामिनी |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
चतुर्थो मोक्ष इत्येव पृथगर्थः पृथग्गणः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
चतुर्थो व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितः ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति वहवो गृहे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
जनमेजय़ उवाच
चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
चतुर्दंष्ट्राश्चतुर्जिह्वाः शङ्कुकर्णाः किरीटिनः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दंष्ट्रोऽष्टजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
चतुर्दन्तं सुदान्तं च वारणेन्द्रं श्रिय़ा वृतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्दश पिशाचानां कोट्यो मे वचने स्थिताः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दश रथश्रेष्ठो घोरानाशीविषोपमान् |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्दश सहस्राणि जघान भुवि रक्षसाम् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दश सहस्राणि यानि शिष्टानि भारत |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दश सहस्राणि सौवलं पर्यवारय़न् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दशभिरत्युग्रैर्नाराचैरविचारय़न् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दशमिमं वर्षं यन्नापश्यमरिन्दम |
४६ क