कर्ण पर्व
अध्याय
२७
कर्ण उवाच
स्ववीर्येऽहं पराश्वस्य प्रार्थय़ाम्यर्जुनं रणे |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
स्ववृत्ताद्यो न चलति शास्त्रचक्षुः स मानवः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
स्ववृत्तिमभिपन्नाय़ लिङ्गिने वेतराय़ वा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
स्ववेददक्षिणाय़ाथ विमर्दे मातुलेन ह ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्ववेश्मनि यथान्याय़मुपास्ते भैक्षमेव च |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
स्वशक्त्या किं करोमीह तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
स्वशक्त्याहं ददानीति त्वय़ा पूर्वं प्रभाषितम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वशरीरसमुत्थं तु ज्ञानेन विनिवर्तय़ेत् ||
३१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वशरीरेण सम्प्राप्तं नान्यं शुश्रुम पाण्डवात् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
स्वशरीरेष्वनित्येषु नित्यं किमनुचिन्तय़ेत् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
स्वशरीरैः परित्राणं वाह्यानां सिद्धिकारकम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
स्वशरीरोपरोधेन वरमादातुमिच्छतः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
स्वशास्त्रैः परितुष्टांश्च श्रेय़ो नोपलभामहे ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वशिरः पञ्चशाखाभ्यामभिहत्याय़तेक्षणा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
स्वसञ्ज्ञानस्वजांस्तद्वत्सुतसञ्ज्ञान्कृमींस्त्यजेत् ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
स्वसन्तुष्टः स्वधर्मस्थो यः स वै सुखमेधते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
स्वसन्तुष्टाश्च्युताः स्थानान्मानात्प्रत्यवरोपिताः |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
स्वसा तस्यानवद्याङ्गी द्रौपदी तनुमध्यमा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वसारं परय़ा लक्ष्म्या युक्तामादाय़ कौरवान् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वसारं मामवेक्षस्व स्वस्रीय़ात्मजमेव च |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वसारं वसुदेवस्य शत्रुसङ्घावमर्दिनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
स्वसारमृषय़े तस्मै सुव्रताय़ तपस्विने ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स्वसूतमव्रवीत्क्रुद्धो द्रोणपुत्राय़ मां वह ||
१०१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वसेति वा महावाहो हतपुत्रेति वा पुनः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
स्वसेनय़ा च सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वसेनय़ा सम्प्रय़ान्तं नानुय़ान्ति स्म पृष्ठतः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा राजा दुर्योधनः स्वय़म् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वसैन्यनाय़कार्थाय़ चिन्तामाप भृशं तदा ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति गच्छत्वरिष्टं वै पन्थानमकुतोभय़म् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
स्वस्ति गोभ्योऽस्तु लोकेषु ततो निर्वचनं कृतम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
स्वस्ति चेच्छामि भवतः परेषां च यथात्मनः ||
६० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति चेदिच्छसे राजन्कुलस्यात्मन एव च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्यामि यथागतम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
स्वस्ति ते वरुणो राजा यमश्च समितिञ्जय़ः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स्वस्ति तेऽद्य प्रय़च्छन्तु कार्त्तिकेय़श्च षण्मुखः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि किं च तस्य फलं वद ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे |
१६८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि न स्थानं विद्यते मम ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
व्राह्मण उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधो भुजगसत्तम |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
व्राह्मण उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधय़िष्यामि शोभने ||
४३ ग
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु महावाहो क्षामय़े त्वां प्रसीद मे ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक |
१० क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च भारत |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स्वस्ति तेऽस्त्वेकपादेभ्यो वहुपादेभ्य एव च |
४३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वस्ति देवा न मे कामः सुय़ोधनमुदीक्षितुम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
स्वस्ति द्रोणाय़ सहसा सर्वभूतान्यथाव्रुवन् ||
३० ख