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उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
छत्रं च ते महच्छ्वेतं भीमसेनो महावलः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
छत्रं चिच्छेद भीष्मस्य तूर्णं तदपतद्भुवि ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
छत्रं चिच्छेद समरे राज्ञस्तस्य रथोत्तमात् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
युधिष्ठिर उवाच
छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत्सम्प्रवर्तितम् |
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
छत्रं जाम्वूनदैर्जालैरर्कज्वलनसंनिभैः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
शक्र उवाच
छत्रं तवासीत्सुमहत्सौवर्णं मणिभूषितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
छत्रं तु पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारय़त् |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
छत्रं देवावृधो दत्त्वा सराष्ट्रोऽभ्यपतद्दिवम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
छत्रं ध्वजं धनुश्चास्य छित्त्वा सिंह इवानदत् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
छत्रं ध्वजं निय़न्तारं त्रिवेणुं शम्युपस्करम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
छत्रं ध्वजं निय़न्तारमश्वांश्चास्य न्यपातय़त् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
छत्रं वेष्टनमौशीरमुपानद्व्यजनानि च |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
छत्रं सुच्छत्रो विख्यातः सर्वलोकाश्रय़ो महान् ||
१२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
छत्रं हि भरतश्रेष्ठ यः प्रदद्याद्द्विजातय़े |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
छत्रच्छाय़ासमुचितं तस्य तद्वदनं शुभम् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
छत्रप्रदानेन गृहं वरिष्ठं; यानं तथोपानहसम्प्रदाने |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
छत्रहंसां कर्दमिनीं वाहुपन्नगसङ्कुलाम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
छत्रहंसावलीजुष्टां फेनचामरमालिनीम् ||
११९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
छत्राकृतिशीर्षा मेघौघनिनादाः; सत्पुष्करचतुष्का राजीवशतपादाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
छत्राणां चापविद्धानां चामराणां च संय़ुगे ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
छत्राणां व्यजनानां च शिरसां मुकुटैः सह |
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
छत्राणां व्यजनैः सार्धं मुकुटानां च राशय़ः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
छत्राणां हेमदण्डानां चामराणां च भारत ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि केतूंस्तुरगानथैषां; वस्त्राणि माल्यान्यथ भूषणानि ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि च पताकाश्च सर्वं रक्तमदृश्यत ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि चापविद्धानि रथाश्चक्रैर्विना कृताः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि वालव्यजनानि केतू; नश्वान्रथान्पत्तिगणान्द्विपांश्च |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खाः; स्रजश्च पुष्पोत्तमहेमचित्राः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
छत्राणि वालव्यजनानुषङ्गा; दीप्ता महोल्काश्च तथैव राजन् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
छत्रादिषु कथं न स्यात्तुल्यहेतौ परिग्रहे ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
छत्रादिषु विमुक्तस्य मुक्ताय़ाश्च त्रिदण्डके ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
छत्रादिषु विशेषेषु कथं सङ्गः पुनर्नृप ||
१६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
छत्रादिषु विशेषेषु मुक्तं मां विद्धि सर्वशः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
छत्रेण ध्रिय़माणेन पाण्डुरेण विराजता ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
छत्रेण ध्रिय़माणेन प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
छत्रेण ध्रिय़माणेन वीज्यमानश्च चामरैः |
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
छत्रैराभरणैर्वस्त्रैर्माल्यैश्च सुसुगन्धिभिः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
छत्रैश्च वहुधा छिन्नैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
छत्रैस्तथापविद्धैश्च चामरव्यजनैरपि ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
छद्मना तु भवेत्सिद्धिः शत्रूणां च क्षय़ो महान् ||
४६ ग
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
छद्मना निर्जितास्ते हि कर्शिताश्च महावने |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
छद्मना निहतं श्रुत्वा पितरं पापकर्मणा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
छद्मना मम काकश्च गमितो यमसादनम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
छद्मना शरदं चैकां धृतराष्ट्रस्य शासनात् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
छद्मना हृतराज्याश्च निःस्वाश्च वहुशः कृताः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
छद्मनापहृतं क्षुद्रैर्धार्तराष्ट्रैः ससौवलैः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
छन्दतश्च यथानित्यमर्हान्युञ्जीत नित्यशः |
६ ख