सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवाससः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
फलमूलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
फलमूलाशनामेकां यत्रसाय़म्प्रतिश्रय़ाम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलाशनास्ते हि सुखार्हा दुःखमुत्तमम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
फलमूलाशने युक्तस्त्वं तथातिथिभोजने |
७२ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्वरैः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलाशनो राजा वने संन्यवसच्चिरम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
फलमूलाशिनां राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां तथा ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलाशिनां राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
फलमूलोत्कराहारः शान्तः शिष्टाकृतिर्यथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
फलमेकं सुताय़ादाद्राजपुत्राय़ चापरम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
राजपुत्र उवाच
फलमेतत्प्रपश्यामि यथालव्धेन वर्तय़े ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
फलमेतस्य तपसः कथय़ध्वं दिवौकसः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
फललाभश्च सद्यः स्यात्सर्वभूतहितं च तत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
फलवन्ति च कर्माणि व्युष्टिमन्ति ध्रुवाणि च |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
फलाद्रसं स लभते वीजाच्चैव फलं पुनः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विन्दते च सः ||
१३६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
फलानि च विचित्राणि तथा भोज्यानि भूरिशः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१११
ऋश्यशृङ्ग उवाच
फलानि पक्वानि ददानि तेऽहं; भल्लातकान्यामलकानि चैव |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
युधिष्ठिर उवाच
फलानि महतां श्रेष्ठ प्रव्रूहि परिपृच्छतः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
फलानि माल्यानि सुसंस्कृतानि; चर्माणि वर्माणि तथासनानि |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
फलानि वृक्षमारुह्य प्रचिन्वन्ति च ते यदा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
फलानि शातय़ामास सम्यक्परिणतान्युत ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
फलान्यमृतकल्पानि भक्षय़न्स्म यथेष्टतः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
फलान्युपधिय़ुक्तानि य एवं नः प्रय़च्छसि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
मणिभद्र उवाच
फलान्येवाय़मश्नातु काय़क्लेशविवर्जितः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
फलाफलवती शाखे यथैकस्मिन्वनस्पतौ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजालक्षणभावनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
फलार्थी सत्पथत्यक्तः प्राप्नोति विषय़ात्मकम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
फलाहारः प्रविचरन्कृत्स्नं जगदिदं तदा ||
१०९ ग
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
शकुन्तलो उवाच
फलाहारो गतो राजन्पिता मे इत आश्रमात् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वय़ा सह सुमध्यमे |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
फलिष्यति न ते विद्या यत्त्वं मामात्थ तत्तथा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
फले क्षीणे महाराज फलं पुण्यमवाप्स्यसि ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
फलेन तस्य सर्वस्य सव्यसाची जय़त्वरीन् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
फलेनानेन संय़ुक्तो राजर्षे गच्छ पुण्यताम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
फलैरमृतकल्पैस्तानाचितान्स्वादुभिस्तरून् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
फल्गु यच्च वलं किञ्चित्तथैव कृशदुर्वलम् |
५४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
फल्गुनं च युधां श्रेष्ठं विधिवत्सहदेवजः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
फल्गुनं नकुलं चैव सहदेवं च माधव ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
फल्गुनं प्रति दुर्धर्षः क्रोधसंरक्तलोचनः ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
फल्गुनं वा भवन्तं वा माद्रीपुत्रावथापि वा |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
फल्गुनस्तु तथेत्युक्त्वा व्यवसाय़पुरोजवः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
फल्गुनस्तु महावाहुः कर्णं वैकर्तनं रणे |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
फल्गुनस्य समक्षं तु न हि पार्थो युधिष्ठिरः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
फल्गुनस्य हि तां मृत्युमवगम्य युय़ुत्सतः |
३८ क