शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
लोकवेदविरुद्धानि तान्येकाग्रमनाः शृणु ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
पाण्डुरु उवाच
लोकश्चाय़ं वरारोहे धर्मोऽय़मिति मंस्यते ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
लोकसंहनना वीरा वीर्यवन्तो महावलाः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
लोकसङ्ग्रहणार्थं तु सा तु धैर्येण लभ्यते ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
लोकसङ्ग्रहधर्मं च नैव कुर्यान्न कारय़ेत् ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
लोकसङ्ग्रहसंय़ुक्तं विधात्रा विहितं पुरा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
लोकसम्भवसन्देहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
लोकसम्भाविताः सन्तः सुनृशंसं करिष्यथ ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
लोकसम्भावितैर्दुःखं यत्प्राप्तं कुरुसत्तम |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
लोकसम्भावितो वीरः कामवीर्यो विहङ्गमः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
लोकसाधारणेष्वेषु मिथ्याज्ञानेन तप्यते ||
१४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
लोकसृष्टिं प्रपश्यन्तो न मुह्यन्ति विचक्षणाः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
लोकस्तद्वेद यदहं पितुः प्रिय़चिकीर्षय़ा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
लोकस्तद्वेद यदहं पितुः प्रिय़चिकीर्षय़ा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वासुदेव उवाच
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशां पते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय़ आसीन्महाय़शाः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
लोकस्य नान्यतो वृत्तिः पाण्डवान्यत्र कर्मणः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
लोकस्य पश्यतो राजन्स्थापय़ाम्यभिमन्त्रणात् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
लोकस्य विविधं वृत्तं प्रकृतेश्चाप्यकुत्सय़न् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
लोकस्य संस्था न भवेत्सर्वं च व्याकुलं भवेत् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
लोकस्य समवज्ञातं निहीनाशनवाससम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
लोकस्य समुदीर्णस्य निधनाय़ान्तको यथा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
लोकस्य सीमन्तकरी मर्यादा लोकभावनी |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
लोकस्यानुग्रहार्थाय़ स्थापिता व्रह्मणा भुवि ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकस्येश्वरतां भूय़ः शत्रुभिश्चाप्रधृष्यताम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
लोका यत्रोद्धृताः पूर्वं विष्णुना प्रभविष्णुना ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
लोका लोकेश्वराश्चैव सर्वे व्राह्मणपूर्वकाः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
लोका हि सर्वे तपसा ध्रिय़न्ते; तस्मात्त्वरध्वं तपसः क्षय़ाय़ |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
लोका ह्येवं वर्तय़न्ति अन्योन्यं समुपाश्रिताः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
लोकांश्च तापय़ानं वै विद्धि कर्णं च शोभने |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
लोकांश्च लभते विप्रो नान्यथा लभते हि सः ||
४५ ग
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
लोकांश्चास्त्रजितान्पश्चाल्लभेय़ं सुरपुङ्गव ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
लोकांस्तारय़ितुं कृत्स्नान्मर्त्येषु क्षितिदेवताः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
लोकाः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च वलं महत् |
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाः सन्तानका नाम भविष्यन्त्यस्य पार्थिव |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
लोकाः स्वस्था भवन्त्वद्य तस्मिन्विनिहतेऽसुरे ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाचारात्मसम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसंमताः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
लोकात्पुण्यादिह भ्रष्टाः सन्तानप्रक्षय़ाद्विभो ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्नाः; स्वधीतविद्याः सुरकार्यहेतोः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
लोकादस्मात्परं लोकं यः पश्यति स मुच्यते ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ साङ्ख्ययोगनिधे विभो ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः |
२८ क