chevron_left  छित्त्वाarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
छित्त्वा त्रिधा पातय़ामास भूमौ; ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा धनुर्वेगवता शरेण; द्वाभ्यामविध्यत्सुभृशं नरेन्द्रम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा धनूंषि वीराणां शरांश्च वहुधा रणे |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा धनूंषि शूराणामार्जुनिः कर्णमार्दय़त् |
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा ध्वजं शतेनैव शतधा पुरुषर्षभः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा पञ्चाशतेषूणां पार्षतं समविध्यत ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा पाञ्चालराजस्य द्रौणिरन्यैः समार्दय़त् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा भल्लेन समरे विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा भीमो महाराज नादं सिंह इवानदत् ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
छित्त्वा योगाः परं मार्गं गच्छन्ति विमलाः शिवम् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा रथेषां नकुलस्य सोऽथ; युधिष्ठिरं भीमवलोऽभ्यधावत् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा वाणशतैरुग्रैस्तानविध्यदसम्भ्रमः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा शक्तिं ततो भीमो निर्मुक्तोरगसंनिभाम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा शरासनं शत्रोर्नागमामित्रमार्दय़त् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
छित्त्वा स्तम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
छित्त्वाधर्ममय़ं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वानदत्पाण्डुसुतस्य वीरो; युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वापि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद्द्रोणाय़ाङ्गुष्ठमात्मनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
छित्त्वाशु ज्ञानशस्त्रेण तपोदण्डेन भारत ||
६० ग
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वाश्वरश्मींस्तुरगानविध्य; त्ते तं रणादूहुरतीव दूरम् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
छित्त्वास्य वाहू वरचन्दनाक्तौ; भल्लेन काय़ाच्छिर उच्चकर्त ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
छित्त्वैनं संशय़ं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
छिद्यते ह्याततं सर्वं प्रमाणं पश्य भारत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
छिद्यन्ते च ध्वजाग्राणि तोमराणि धनूंषि च ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
छिद्यमानस्य महतो वनस्येव परश्वधैः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
छिद्यमानाः शितैः शस्त्रैः क्षत्रधर्मपराय़णाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
छिद्रं तु तस्य तद्दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ८
शकुनिरु उवाच
छिद्रं वहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
छिद्रं हि न प्रपश्यन्ति रथय़ोराशुविक्रमात् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
वृहस्पतिरु उवाच
छिद्राणि वसनस्येव साधुना विवृणोति यः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
छिद्राण्यत्र हि वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना व्रह्मराक्षसाः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
छिद्रान्वेषी न सन्धेय़ः सन्धेय़ानपि मे शृणु ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
छिद्रेषु तेषु तं वाणैर्माद्रीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
छिद्रेष्वेतेषु हि सदा ह्यधृष्येषु द्विजर्षभ |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
छिन्दंस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महाजवः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
छिन्दन्ति क्षमय़ा क्रोधं कामं सङ्कल्पवर्जनात् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासं लघ्वाहारतय़ा नृप ||
५५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
छिन्दन्भिन्दन्रुजन्कृन्तन्दारय़न्प्रमथन्नपि |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
छिन्दन्वनं परशुनेव शूर; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
छिन्द्यामहं शिरस्तस्य इत्युपांशुव्रतं मम ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति सः ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
छिन्धि भिन्धि प्रधावध्वं पातय़ाभिसरेति च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
छिन्धि भिन्धीति यस्यैतच्छ्रूय़ते वाहिनीमुखे |
२२ क