उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
जगतः पश्यतोऽभीक्ष्णं भूतानामनुकम्पय़ा ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
जगतः प्रक्षय़करं घोररूपं भय़ानकम् ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
जगतश्चिन्तय़न्सृष्टिं चित्रां वहुगुणोद्भवाम् ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठः प्रभवश्चाप्ययश्च ह |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
जगतीस्थानिवाद्रिस्थः किं ततः परमं सुखम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
जगतीस्थानिवाद्रिस्थः प्रज्ञय़ा प्रतिपश्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
जगतीस्थानिवाद्रिस्थो मन्दवुद्धीनवेक्षते ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
जगतो धारणार्थाय़ विज्ञाप्यं कुरु मे प्रभो ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
जगतो यः स सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
जगतोऽनुग्रहार्थाय़ याचितो मे जगत्पतिः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
जगत्पतिरनिर्देश्यः सर्वगः सर्वभावनः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
जगत्प्रतिभय़ाकारं दुष्प्रेक्ष्यमभवत्तदा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीय़ते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
जगत्यनित्ये सततं प्रधावति; प्रचिन्तय़न्नस्थिरमद्य लक्षय़े |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
जगत्युपशमं याते नष्टय़ज्ञोत्सवक्रिय़े |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
जगत्सन्दीपय़न्भीमो मम दुःखविवर्धनः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
जगत्सपातालविय़द्दिगीश्वरं; प्रकम्पय़ामास युगात्यये यथा ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
जगत्सम्प्लावय़ामास धृतराष्ट्रदय़ाम्वुधिः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
जगत्सर्वं च वार्ष्णेय़े निखिलेन प्रतिष्ठितम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
जगत्स्थितानि सर्वाणि समान्याहुर्मनीषिणः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
जगत्स्रष्टुमना देवो हरिर्नाराय़णः स्वय़म् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
जगदासीन्निरुत्साहं कालेय़भय़पीडितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
जगद्दग्ध्वामितवलः केवलं जगतीं ततः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
जगद्भारत संविग्नं यथार्कपतनेऽभवत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ||
१३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
जगद्वितिमिरं चापि प्रदीप्तमकरोत्तदा |
१० क
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
जगद्विनिर्दहेत्सर्वमल्पतेजसि पातितम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
जगद्विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ||
७५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
जगद्व्याप्तमिदं सर्वं वृत्रेणासुरसूदन ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
जगन्मोहात्मकं प्राहुरव्यक्तं व्यक्तसञ्ज्ञकम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
जगर्जुरुच्चैर्वलवच्च विव्यधुः; शरैः सुमुक्तैरितरेतरं पृथक् ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा विप्रिय़ं वचः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
जगाद जगतः स्रष्टा परं परमधर्मवित् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
जगाद वाक्यं द्विपदां वरिष्ठं; नाराय़णं लोकहिताधिवासम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
जगाद शरणं देवो व्रह्माणं परवीरहा ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
जगादैवं तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम् ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
जगाम काले धर्मात्मा दिष्टान्तं पुत्रपौत्रवान् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वय़म् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वय़म् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम कौशिकीं पुण्यां रम्यां शिवजलां नदीम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
जगाम च स्वभवनं चण्डालो भरतर्षभ ||
११७ ग
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
जगाम चम्पां प्रदिधक्षमाण; स्तमङ्गराजं विषय़ं च तस्य ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
जगाम चैनमादाय़ वेगेन पुरुषोत्तमः ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वय़म् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तत्र यत्र स्म पाण्डवा भरतर्षभ ||
११ ख