chevron_left  सञ्चिच्छिदतुरप्यस्यarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सञ्चिच्छिदतुरप्यस्य ध्वजं कार्मुकमेव च ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
सञ्चिच्छेदार्जुनिर्वृत्तांस्त्वदीय़ानां सहस्रशः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
सञ्चितं सञ्चितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
सञ्चिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षय़ा नरः |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चिन्त्य निपुणं वुद्ध्या धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
सञ्चिन्त्य मनसा धीरो निश्चय़ं नाध्यगच्छत ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
सञ्चिन्त्य मनसा राजन्विदित्वा शक्तिमात्मनः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
सञ्चिन्त्य मनसा सर्वं गुणदोषवलावलम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
जमदग्निरु उवाच
सञ्चिन्त्य वार्षिकं किञ्चित्तेन पीवाञ्शुनःसखः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
सञ्चिन्त्य स महातेजा वनमेवान्वरोचय़त् |
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनः पुनः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
सञ्चिन्त्योग्रेण तपसा महात्मानं महेश्वरम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
सञ्चिन्तय़सि धर्मार्थौ याम उत्थाय़ पश्चिमे ||
७५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
सञ्चिन्तय़ामि वार्ष्णेय़ सदा कुन्तीसुतं रहः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सञ्चिन्तय़ित्वा च जना विसस्रु; र्यथासुखं खं च महीतलं च ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
सञ्चिन्वन्धीर आसीत शिलाहारी शिलं यथा ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
सञ्चिन्वानकमेवैकं कामानामवितृप्तकम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
सञ्चिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
सञ्चिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
सञ्चुकोच महाराज चर्मेवाग्नौ समाहितम् ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सञ्चुक्रुधे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ||
६७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
सञ्चुक्षुभे महाराज वातैरिव महार्णवः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चोदितास्तुम्वुरुणा गन्धर्वाः सहिता जगुः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चोदितो देवय़ान्या महर्षिः पुनराह्वय़त् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सञ्चोदितो भीमजनार्दनाभ्यां; स्मृत्वा तदात्मानमवेक्ष्य सत्त्वम् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
सञ्चोदितो भीमसेनेन चैवं; स सारथिः पुत्रवलं त्वदीय़म् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
सञ्चोदय़ हय़ान्क्षिप्रं धार्तराष्ट्रचमूं प्रति |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
सञ्चोदय़त्यसौ कर्णो धार्तराष्ट्रान्महावलान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सञ्चोदय़ितुमारेभे मार्जारो मूषकं तदा ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
सञ्चय़ांश्च न कुर्वीत जातु शूद्रः कथञ्चन ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
सञ्चय़ांश्च न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जय़ेत् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
सञ्चय़ांश्च विनाशान्तान्न क्वचिद्विदधे मनः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
सञ्चय़ानुविसर्गी स्याद्राजा शास्त्रविदात्मवान् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
सञ्चय़ानेवमादीनां कारय़ेत नराधिपः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
सञ्चय़े च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सञ्चय़ेनापि चाल्पेन भवन्त्याढ्या मदान्विताः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
सञ्चय़ो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव कानने |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्नं शरजालेन रथं दृष्ट्वा सकेशवम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
सञ्छन्नं सुमुहूर्तेन नौस्थानेनेव सागरः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्ना पाण्डवी सेना न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्ना पृथिवी जज्ञे कुसुमैः शवला इव ||
९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्ना वसुधा तत्र द्यौर्ग्रहैरिव भारत ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्ना वसुधा भाति वसन्ते कुसुमैरिव ||
३४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
सञ्छन्ना वसुधा राजन्पर्वतैरिव सर्वतः ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सञ्छादिता महाराज यतमाना महारथाः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
सञ्छादिताभवद्भूमिस्ते च शूरा महारथाः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
सञ्छादितौ रथस्थौ तावुभौ कृष्णधनञ्जय़ौ ||
११२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्य समरे शल्यं नकुलः परवीरहा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानं समरे द्रोणं दृष्ट्वा महारथम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्यमानः कर्णेन वहुधा पाण्डुनन्दनः ||
१९ ख