आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तत्र यत्र स्म रुवन्ति जलचारिणः ||
१२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तत्र यत्रास्ते देवराजः शतक्रतुः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तत्र यत्रास्ते नारदः पाण्डवैः सह ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम् ||
६० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तदहश्चापि तेषां वर्षशतं यथा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
जगाम तद्वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षय़ः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तपसे धीमान्हिमवन्तं शिलोच्चय़म् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
जगाम तव सैन्यस्य मध्येन रथिनां वरः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तां भार्गवकर्मशालां; यत्रासते ते पुरुषप्रवीराः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तानि तीर्थानि द्रष्टुं पुरुषसत्तमः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तानि सर्वाणि तीर्थान्याय़तनानि च |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तीर्थं मुदितः क्रमेण; ख्यातं महद्वृद्धकन्या स्म यत्र ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तीर्थं सुसमाहितात्मा; शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम् ||
६१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तेषां सा रात्रिः पुण्या रतिविहारिणाम् |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम तैर्वृतो राजन्नृषिभिर्यैः समागतः ||
७२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
जगाम त्रिदिवं भूय़ः क्षिप्रं वलनिषूदनः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम त्रिदिवं राजन्विश्वामित्रोऽभवन्नृपः |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम त्रिदिवं राजन्सन्त्यज्येह कलेवरम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम त्रिदिवं हृष्टः स्तूय़मानो महर्षिभिः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
जगाम त्रिदिवं हृष्टस्तक्षापि स्वगृहान्ययौ ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
जगाम त्वरितस्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनाश्रय़म् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
जगाम त्वरितो राजन्येन यातो धनञ्जय़ः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम त्वरितो रामस्तीर्थं श्वेतानुलेपनः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
जगाम दक्षिणं मार्गं सोमो व्यावृत्तलक्षणः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
जगाम दक्षिणामाशामुदीचीं तु पुरन्दरः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
जगाम दारय़न्भूमिं रुधिरेण समुक्षितः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
जगाम दुःखात्तं देशं यत्र वै दारिता मही ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
जगाम धरणिं वाणो लोहितार्द्रीकृतच्छविः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
जगाम धरणीं क्षुद्रः खं चैव सहसागमत् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
जगाम धरणीं तूर्णं महोरग इवाशय़म् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम धर्मराजाय़ पुष्पमादाय़ तत्तदा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम धृतराष्ट्रस्य क्षय़ं प्रक्षीणवान्धवम् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं व्राह्मणोत्तमः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम नगराय़ैव परिक्रोशंस्तदार्तवत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
जगाम परमं त्रासं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ||
५७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
जगाम परमां सिद्धिं तदा भरतसत्तम ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम पाण्डवान्दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम् ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम पितृलोकाय़ न लेभे तत्र तत्फलम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम पुत्रकानेव त्वरिता पुत्रगृद्धिनी ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम पुत्रमादाय़ तमृषिं प्रति च प्रभो ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
जगाम भगवान्व्यासो यथाकाममृषिः प्रभुः ||
२० ख