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वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
चक्रे क्षेमं पुनर्धीमान्धर्मारण्यं स राघवः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालविः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
चक्रे च मन्त्रानुचरं सुहृदं लक्ष्मणस्य च ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्ये नातिमहन्मुखम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
चक्रे च सततं पूजां विष्वक्सेनाय़ भारत |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
चक्रे चतुर्विंशतिपर्वय़ोगे; षड्यत्कुमाराः परिवर्तय़न्ति ||
१५० ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
चक्रे चात्मविनाशाय़ वुद्धिं स मुनिसत्तमः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
चक्रे चानुपमां पूजां तस्याश्चापि स सर्ववित् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
चक्रे चाभ्यधिकं पार्थात्स्ववीर्यं प्रतिदर्शय़न् ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे तत्र स सङ्ग्रामं सह भोजेन भारत |
८ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे तस्य हि साहाय़्यं भगवान्हव्यवाहनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १११
लोमश उवाच
चक्रे नाव्याश्रमं रम्यमद्भुतोपमदर्शनम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे निवेशनं राजा पाण्डवः सह सैनिकैः |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे निशि महद्राजन्नाजग्मुस्तत्र योषितः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम् ||
७७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
चक्रे पूजां देवराजाय़ चाग्र्यां; यथाशास्त्रं विधिवत्प्रीय़माणः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
चक्रे प्रधिरिवासक्तो नास्य शक्यं पलाय़ितुम् ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे प्रसादं च तदा तस्य राज्ञो विभावसुः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
चक्रे युगेषां तूणीराननुकर्षं च साय़कैः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
चक्रे रथस्य तिष्ठन्तं ध्रुवस्याव्ययकर्मणः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
चक्रे लोकेश्वरं तत्र तेनातुष्यन्त चारणाः ||
४८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
चक्रे विमुखमासाद्य मय़ं शक्र इवाहवे ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
चक्रे विवाहुशिरसं भूतकर्माणमाहवे ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे स विविधाः सञ्ज्ञाः प्रत्यक्षं च पुनः पुनः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ किं नु तात युय़ुत्ससे ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
चक्रेण वासुदेवश्च तन्मदर्थे प्रदीय़ताम् |
४ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महाय़शाः ||
३० ग
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
चक्रेणोत्कृत्तमपतच्चालय़द्वसुधातलम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
चक्रेऽदृश्यं साश्वसूतं सध्वजं पृतनान्तरे ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
चक्रेऽपसव्यं त्वरितः स्यन्दनेन जनार्दनः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
चक्रैर्विमथितैः केचित्केचिच्छिन्नैर्महाध्वजैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
चक्रैर्विमथितैरक्षै भग्नैश्च वहुधा युगैः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
चक्रैर्विमथितैश्छिन्नैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
चक्षार रुधिरं भूरि गिरिः प्रस्रवणैरिव ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
चक्षुः श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
चक्षुः श्रोत्रे नासिका त्वक्च जिह्वा; ज्ञानस्यैतान्याय़तनानि जन्तोः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तु न जीर्यते ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च विद्यया ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
चक्षुःस्थश्च तथादित्यो रूपज्ञाने विधीय़ते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
चक्षुरध्यात्ममित्याहुर्यथाश्रुतिनिदर्शनम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
चक्षुराचारवित्प्राज्ञो मनसा दर्शनेन च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
चक्षुरालोकनाय़ैव संशय़ं कुरुते मनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
चक्षुरालोचनाय़ैव संशय़ं कुरुते मनः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
चक्षुर्ददानि ते हन्त युद्धमेतन्निशामय़ ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम् |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
चक्षुर्दिव्यं प्रददौ तान्स सर्वा; न्राजापश्यत्पूर्वदेहैर्यथावत् ||
३६ ख