chevron_left  जागर्मिarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
जागर्मि नावसुप्तोऽस्मि हतोऽसीति च दारुणः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
जागर्मि रात्रय़ः सर्वा दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
जागुडान्रमठान्मुण्डान्स्त्रीराज्यानथ तङ्गणान् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
जाग्रतश्च स्वपन्तश्च व्रजन्तः पथि संस्थिताः |
१५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
धृतराष्ट्र उवाच
जाग्रतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेय़ो यदिह पश्यसि |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
जाग्रत्स्वपंश्च कौन्तेय़ कर्णमेव सदा ह्यहम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
जमदग्निरु उवाच
जाजमद्यजजा नाम मृजा माह जिजाय़िषे |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
जाजलिं कष्टतपसं ज्ञानतृप्तस्तदा नृप ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
जाजले तीर्थमात्मैव मा स्म देशातिथिर्भव ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
जाज्वल्यमानं कोपेन कृष्णाधर्षणजेन ह ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभैः |
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
जाज्वल्यमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
जाज्वल्यमानमुशनस्तेजसेह; तत्साधय़ामास महं वरेण्यम् ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
जाज्वल्यमानस्य यथा पर्वतस्येव सर्वतः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षात्पद्मामिव श्रिय़म् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
जात एव तव स्रावस्त्वं तु मोहान्न वुध्यसे ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
जातं जातं पाण्डवेभ्यः पुष्पमादत्स्व भारत |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
जातं जातं मोक्षय़िष्ये जन्मतो मानुषादिति ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
जातं जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
जातं मर्त्यं जरय़ति निमेषं नावतिष्ठते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
जातं महावलानां वै तान्प्रवक्ष्यामि किं त्वहम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
जातं वापि जनिष्यं वा द्वितीय़ं वापि सम्प्रति ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
जातं सप्तर्षिभार्याभिर्व्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
जातः कमलपत्राक्ष हनूमान्नाम वानरः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
जातः पुत्रस्तवेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत् ||
७६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
जातः पुत्रो वासवविक्रमोऽय़ं; सर्वाञ्शूराञ्शात्रवाञ्जेष्यतीति ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
जातः पुरा महाराज महाकीर्तिर्महावलः ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु; प्रव्राज्य कौन्तेय़मथापि राज्यात् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
जातकर्मणि पुत्राणां तवापि विदितं तथा ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
जातकर्मणि यत्प्राह पिता यच्चोपकर्मणि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
जातकर्मप्रभृत्यस्य कर्मणां दक्षिणावताम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
जातकर्माणि सर्वाणि कारय़ामास पार्थिवः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनय़नानि च |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
जातकर्माण्यानुपूर्व्याच्चूडोपनय़नानि च |
८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
जातकर्मादिकान्सर्वांस्त्रिषु वर्णेषु भारत |
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
गन्धर्व उवाच
जातकर्मादिकास्तस्य क्रिय़ाः स मुनिपुङ्गवः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
जातकर्मादिकास्तस्य क्रिय़ाश्चक्रे महामुनिः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
जातकर्मादिकास्तस्य क्रिय़ाश्चक्रे वृहस्पतिः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यकृतां वरः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
जातकौतूहलाः पार्थ पप्रच्छुर्नृपतेः सुतम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
जातकौतूहलो नित्यं सिद्धश्चरसि साक्षिवत् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
वैशम्पाय़न उवाच
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोवलात् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
जातगृध्याभिपन्नाश्च पाण्डवानामनेकशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
जातपक्षः परिस्पन्देद्रक्षेद्वैकल्यमात्मनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
तुलाधार उवाच
जातपक्षा यदा ते च गताश्चारीमितस्ततः |
५० क