chevron_left  जातस्नेहस्यarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रय़ोगे महत्तरम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
जातस्नेहाश्च तं वालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ||
७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
जातस्नेहाश्च सौहार्दात्पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
जातस्पर्धास्ततस्ते तु तपसे धृतनिश्चय़ाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
जातस्य पार्थिवैश्वर्ये सृष्टिरिष्टा विधीय़ते ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्याः सुतस्य च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
जातस्याध्ययनं पुण्यमिति वृद्धानुशासनम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
जाता दन्तिवरा राजञ्शेरते वहवो हताः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
युधिष्ठिर उवाच
जाता परमधर्मिष्ठा दिव्यसंस्थानसंस्थिता |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
जाता मनोरन्ववाय़े ऐलवंशविवर्धनाः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
शौनक उवाच
जाता वै भुजगास्तात वीर्यवन्तो दुरासदाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
जाता हीय़ं वसुमती भाराक्रान्ता तपस्विनी ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
जाताः कुले अनृशंसा वदान्या; ह्रीनिषेधाः कर्मणां निश्चय़ज्ञाः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
जाताः कृतय़ुगे राजन्धनिनः प्रिय़दर्शनाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महावलाः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
जाताञ्जातान्प्रक्षिपास्मान्स्वय़ं गङ्गे त्वमम्भसि ||
४० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
जातानां समवर्णासु पुत्राणामविशेषतः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
जातानां सर्वभूतानां न पक्षा न पुनः क्षपाः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९१
वसव ऊचुः
जातान्कुमारान्स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
जातान्दिव्यास्त्रविदुषः शक्रप्रतिमतेजसः ||
१६४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
जातान्पुत्रान्स निर्वेदाद्धिग्वन्धूनिति चाव्रवीत् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
जाताश्चाप्यवशास्तत्र भिद्यमानाः पुनः पुनः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
जातिं स्मराम्यहं व्रह्मन्नवधानेन मे शृणु ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
जातिजन्मजरादुःखे नित्यं संसारसागरे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
जातिनिर्वेदमुक्त्वा हि कर्मनिर्वेदमव्रवीत् |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
जातिमात्रह्रदे चैव तथा कन्याश्रमे नृप ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
जातिमात्रह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
जातिश्रेण्यधिवासानां कुलधर्मांश्च सर्वतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
जातिष्वन्यास्वपि यथा न भवेय़ं कुलान्तकृत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
जातिस्मर उपस्पृश्य शुचिः प्रय़तमानसः |
११० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
जातिस्मरत्वं तु मम केनचित्पूर्वकर्मणा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति दृष्टमेतत्पुरातने ||
१३७ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति स्नात्वा तत्र न संशय़ः ||
११० ख
वन पर्व
अध्याय २०६
ऋषिरु उवाच
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
जातिस्मरो महानुष्ट्रः प्राजापत्ययुगोद्भवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
जातिस्मृतिरय़स्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्वुभक्षणम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्राह्मण उवाच
जातीः पुण्या ह्यपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
जातीः स स्मरते वह्वीर्नाकपृष्ठे च मोदते ||
८७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
जातीनां व्राह्मणः श्रेष्ठः श्रेष्ठस्त्वमसि धन्विनाम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
जातीमरणजं दुःखं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः |
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पुण्यपापय़ोः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
जातीमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
जातीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
जातुषं तद्गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम् ||
२ ख